तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ राज्य के होमगार्ड विभाग के एक जिला कार्यालय से जुड़ा कथित मामला इन दिनों विभागीय गलियारों और जवानों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा है कि जिले के एक जिला सैनिक होमगार्ड परिसर स्थित गेस्ट हाउस में जिला सेनानी और उनकी महिला अधिकारी मित्र के साथ दिल्ली की एक संस्था से जुड़े पदाधिकारी के आपत्तिजनक स्थिति में पाए जाने की बात सामने आई। बताया जा रहा है कि संबंधित पदाधिकारी का मूल निवास जबलपुर बताया जाता है और वह छत्तीसगढ़ दौरे पर आया था।सबसे गंभीर चर्चा इस बात को लेकर है कि कथित घटनाक्रम के बाद संबंधित व्यक्ति से लाखों रुपये की रकम वसूले जाने की बात जवानों के बीच कही जा रही है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही इस संबंध में कोई आधिकारिक शिकायत, एफआईआर अथवा विभागीय जांच की जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने आई है। ऐसे में पूरे घटनाक्रम की वास्तविकता जांच का विषय है।मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इससे पहले भी ‘सर्वव्यापी’ ने राज्य के एक जिला सेनानी से जुड़ी कथित निजी गतिविधियों और विभागीय चर्चाओं को लेकर सवाल उठाते हुए खबर प्रकाशित की थी। अब ताजा चर्चाओं ने पुराने मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।*सरकारी परिसर में निजी गतिविधियां तो जिम्मेदारी किसकी?*यदि सरकारी गेस्ट हाउस या कार्यालय परिसर का उपयोग निजी गतिविधियों के लिए हुआ है, तो यह केवल व्यक्तिगत आचरण का विषय नहीं रह जाता, बल्कि सरकारी संसाधनों और कार्यालयीन अनुशासन से जुड़ा सवाल भी बन सकता है। आखिर सरकारी परिसर में बाहरी लोगों का प्रवेश किस अनुमति के तहत हुआ? गेस्ट हाउस में ठहरने अथवा प्रवेश का रिकॉर्ड क्या कहता है? आगंतुक रजिस्टर में संबंधित व्यक्ति का नाम दर्ज है या नहीं? सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध है तो उसमें क्या सामने आता है?इन सवालों का जवाब विभागीय जांच के जरिए ही स्पष्ट हो सकता है।*‘लाखों की वसूली’ की चर्चा ने बढ़ाई गंभीरता*पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर दावा कथित तौर पर लाखों रुपये की वसूली से जुड़ा है। यदि वास्तव में किसी व्यक्ति से दबाव, धमकी या किसी अन्य माध्यम से रकम ली गई है तो यह अलग प्रकृति का गंभीर आरोप होगा। ऐसी स्थिति में केवल विभागीय स्तर पर नहीं, बल्कि सक्षम जांच एजेंसी के स्तर पर भी तथ्य सामने लाने की जरूरत होगी।वहीं यदि यह दावा निराधार है तो संबंधित अधिकारी और विभाग के पास भी इसे स्पष्ट करने का पूरा अवसर है। इसलिए सवाल किसी व्यक्ति के निजी जीवन पर टिप्पणी करने का नहीं, बल्कि सरकारी परिसर, पद की गरिमा, बाहरी व्यक्तियों की आवाजाही और कथित आर्थिक लेन-देन की पारदर्शिता का है।*जवानों की चर्चाओं से आगे बढ़े जांच*होमगार्ड जवानों के बीच चल रही चर्चाओं को स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन जब किसी सरकारी कार्यालय और वरिष्ठ अधिकारी से जुड़े गंभीर आरोप लगातार चर्चा में हों, तब विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए तथ्यों की जांच करना महत्वपूर्ण हो जाता है।जरूरत इस बात की है कि संबंधित जिला कार्यालय के गेस्ट हाउस के रिकॉर्ड, आगंतुक रजिस्टर, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज, संबंधित अधिकारियों के बयान और कथित आर्थिक लेन-देन से जुड़े तथ्यों की निष्पक्ष जांच की जाए। जांच के बाद जो तथ्य सामने आएं, उसी के आधार पर जिम्मेदारी तय हो।*विभाग की चुप्पी भी सवालों के घेरे में*ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल विभागीय पारदर्शिता का होता है। यदि आरोप गलत हैं तो विभाग को तथ्य सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि आरोपों में प्रथम दृष्टया तथ्य पाए जाते हैं तो नियमानुसार जांच एवं कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए।फिलहाल यह पूरा मामला चर्चाओं और अपुष्ट आरोपों के स्तर पर है। इसलिए किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराने के बजाय निष्पक्ष जांच की जरूरत है। ‘सर्वव्यापी’ भी उपलब्ध तथ्यों, आधिकारिक दस्तावेजों और संबंधित पक्षों के पक्ष को सामने रखते हुए इस मामले की पड़ताल जारी रखेगा।




