
विकास नंद/सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी के बीच बड़ी संख्या में शिक्षकों को जिला स्तर के दफ्तरों में गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के 50,472 पद रिक्त हैं। इसके बावजूद शिक्षकों की सेवाएं स्कूलों से हटाकर कार्यालयीन और मॉनिटरिंग से जुड़े कार्यों में लिए जाने पर शिक्षाविदों और शिक्षकों के बीच चर्चा तेज है।मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई के लिए शिक्षकों की जरूरत है, जबकि दूसरी ओर कई शिक्षक जिला और ब्लॉक स्तर के कार्यालयों में रिपोर्ट तैयार करने, फाइलों के संधारण और अन्य विभागीय कार्यों में लगाए जा रहे हैं।
डीएमसी, एबीईओ और एडीईओ की मौजूदगी में शिक्षकों से क्लर्क का काम क्यों?
शिक्षकों की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि जब जिला मिशन कोऑर्डिनेटर (डीएमसी), सहायक विकासखंड शिक्षा अधिकारी (एबीईओ) और सहायक जिला शिक्षा अधिकारी (एडीईओ) जैसे अधिकारी पहले से विभागीय व्यवस्था में मौजूद हैं, तो शिक्षकों को कार्यालयीन कार्यों में क्यों लगाया जा रहा है?शिक्षा विभाग की विभिन्न योजनाओं की मॉनिटरिंग, जानकारी संकलन, रिपोर्ट तैयार करने और दस्तावेजी कार्यों के लिए शिक्षकों की ड्यूटी लगाए जाने से स्कूलों में उनकी नियमित शैक्षणिक जिम्मेदारियां प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
पुरानी व्यवस्था का मोह नहीं छोड़ पा रहा विभाग
वर्ष 2019 में राजीव गांधी शिक्षा मिशन का नाम बदलकर समग्र शिक्षा अभियान कर दिया गया था। इसके बावजूद प्रदेश के सभी 33 जिलों में जिला मिशन कोऑर्डिनेटर जैसे पदों की व्यवस्था कायम है। सवाल यह है कि वर्तमान व्यवस्था में इन पदों की वास्तविक आवश्यकता और कार्यभार की समीक्षा कब होगी।
50,472 पद खाली, फिर भी दफ्तरों में तैनाती क्यों?
विधानसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के 50,472 पद रिक्त हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, तब शिक्षकों को जिला स्तरीय प्रशासनिक और मॉनिटरिंग कार्यों में लगाने की जरूरत क्यों पड़ रही है।स्कूलों में भेजे जाएं शिक्षक, तभी सुधरेगी व्यवस्थाशिक्षकों को कार्यालयों से हटाकर स्कूलों में वापस भेजने की मांग उठ रही है, ताकि उनकी सेवाओं का उपयोग सीधे बच्चों की पढ़ाई में हो सके। विभागीय योजनाओं की रिपोर्टिंग और मॉनिटरिंग के लिए उपलब्ध प्रशासनिक अमले का उपयोग किए जाने की जरूरत बताई जा रही है।सवाल यही है कि जब प्रदेश के स्कूलों में हजारों शिक्षक पद खाली हैं, तो शिक्षकों की कमी दूर करने के बजाय कार्यरत शिक्षकों को दफ्तरों में लगाने की व्यवस्था आखिर कब बदलेगी?




