
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
गुजरात के एकता नगर में आयोजित 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भारतीय सिनेमा की उत्कृष्ट प्रतिभाओं को सम्मानित करते हुए फिल्म और मनोरंजन जगत के प्रभावशाली कलाकारों को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थों के प्रचार से बचने की सलाह दी। राष्ट्रपति ने कहा— “स्टार वही है जो रोशनी फैलाए, अंधेरा नहीं।”राष्ट्रपति का संदेश निश्चित रूप से सामाजिक जिम्मेदारी की ओर ध्यान आकर्षित करता है। लेकिन यहीं से एक बड़ा और असहज सवाल भी खड़ा होता है—अगर किसी हानिकारक या नशीले पदार्थ का प्रचार समाज के लिए गलत है, तो केवल अभिनेता और कलाकारों को नसीहत देने से क्या समस्या का समाधान हो जाएगा?कलाकारों से जिम्मेदारी की अपेक्षा की जा सकती है, होनी भी चाहिए। लेकिन नशीले पदार्थों का उत्पादन, तस्करी, अवैध बिक्री और सेवन केवल फिल्मी सितारों के विज्ञापनों से पैदा होने वाली समस्या नहीं है। यह कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य, सीमा प्रबंधन, प्रशासन और केंद्र तथा राज्य सरकारों की नीतियों से जुड़ा व्यापक विषय है।ऐसे में सवाल सीधे केंद्र सरकार से भी पूछा जाना चाहिए—यदि नशा समाज और देश के भविष्य के लिए इतना गंभीर खतरा है, तो सरकार की जिम्मेदारी केवल कलाकारों को समझाने तक सीमित क्यों रहे?राष्ट्रपति ने कलाकारों से कहा कि वे अपनी लोकप्रियता और प्रभाव का इस्तेमाल समाज के हित में करें। लेकिन क्या उसी सामाजिक जिम्मेदारी की कसौटी पर सरकारों को भी नहीं परखा जाना चाहिए? जिस तरह किसी लोकप्रिय अभिनेता के एक विज्ञापन से करोड़ों लोग प्रभावित हो सकते हैं, उसी तरह सरकार के कानून, नीतियां और उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है।फिल्मी सितारा पैसा कमाने के लिए विज्ञापन करता है—यह उसकी व्यावसायिक गतिविधि है। लेकिन उस विज्ञापन की अनुमति किस व्यवस्था के तहत मिलती है, उत्पाद के प्रचार पर क्या नियम लागू हैं, नशीले पदार्थों की अवैध आपूर्ति पर किस स्तर की कार्रवाई हो रही है और युवाओं तक इनकी पहुंच रोकने के लिए सरकार क्या कर रही है—इन सवालों का जवाब भी सार्वजनिक होना चाहिए।सिर्फ कलाकारों को कटघरे में खड़ा करने से तस्वीर अधूरी रहेगी।अगर सरकार मानती है कि नशीले पदार्थ समाज के लिए गंभीर खतरा हैं, तो उसे कठोर और प्रभावी कार्रवाई के जरिए यह संदेश देना चाहिए कि नशे का कारोबार किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं है। तस्करों पर कार्रवाई, अवैध बिक्री पर नियंत्रण, युवाओं को नशे से बचाने के लिए जागरूकता, पुनर्वास व्यवस्था को मजबूत करना और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन जैसे विषयों पर सरकार को अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए।यहां एक और महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—हर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक उत्पाद नशीला पदार्थ नहीं होता और हर विज्ञापन को अवैध कहना भी उचित नहीं होगा। इसलिए बहस तथ्यों और कानून के आधार पर होनी चाहिए, भावनात्मक नारों के आधार पर नहीं।राष्ट्रपति का पद देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक है। इसलिए जब राष्ट्रपति सामाजिक विषय पर संदेश देती हैं, तो स्वाभाविक रूप से वह संदेश व्यापक महत्व रखता है। लेकिन उसी संदेश को आगे बढ़ाते हुए यह सवाल पूछना भी लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है कि नशीले पदार्थों के खिलाफ लड़ाई में सरकारों की जवाबदेही कितनी है और उसका आकलन किस आधार पर किया जा रहा है?फिल्मी कलाकारों को नसीहत देना आसान है, क्योंकि उनकी चमक कैमरे के सामने दिखाई देती है। लेकिन नशे के कारोबार के पीछे का नेटवर्क कैमरे से दूर होता है। वहां सवाल कलाकार से ज्यादा व्यवस्था से है।इसलिए आज जरूरत केवल यह कहने की नहीं कि “स्टार वही है जो रोशनी फैलाए।” जरूरत यह पूछने की भी है कि नशे का अंधेरा फैलाने वाले नेटवर्क पर रोशनी कौन डालेगा?अगर राष्ट्रपति सामाजिक जिम्मेदारी की बात कर रही हैं, तो उसी भावना के साथ केंद्र सरकार से भी अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह नशीले पदार्थों के खिलाफ अपनी नीति, कार्रवाई और उपलब्ध परिणामों को जनता के सामने रखे।कलाकारों की जवाबदेही अपनी जगह है, लेकिन सरकार की जवाबदेही उससे कहीं बड़ी है।क्योंकि सितारे किसी विज्ञापन को कुछ सेकंड के लिए चमका सकते हैं, लेकिन नशे के खिलाफ निर्णायक लड़ाई कानून, प्रशासन और शासन व्यवस्था को ही लड़नी होगी।




