
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला शिक्षा विभाग में प्रशासनिक स्थानांतरण और उसके बाद पदस्थापना को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि शासन के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा प्रशासनिक आधार पर स्थानांतरित किए गए व्याख्याताओं की जिला शिक्षा अधिकारी के विकल्प पर पदस्थापना करने के नाम पर एक कथित बाबू द्वारा 30 हजार से 50 हजार रुपए तक की वसूली की जा रही है। चर्चा यह भी है कि आर्थिक लेन-देन के आधार पर शिक्षकों और व्याख्याताओं को शहर तथा शहर से लगे सुविधाजनक विद्यालयों में पदस्थापना दिलाने का कथित खेल चल रहा है, जबकि जिले के अनेक दूरस्थ और एकल शिक्षकीय विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं।यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल विभागीय अनियमितता नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। आखिर शहर के सुविधाजनक विद्यालयों में पदस्थापना की कथित दौड़ क्यों लगी हुई है और दूरस्थ क्षेत्रों के स्कूलों में विद्यार्थियों की पढ़ाई भगवान भरोसे क्यों छोड़ी जा रही है?बताया जा रहा है कि स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी प्रशासनिक स्थानांतरण आदेशों के बाद व्याख्याताओं को विभिन्न जिलों एवं स्थानों पर पदस्थ किया गया। इसके बाद जिला स्तर पर उपलब्ध विकल्प और रिक्त पदों के आधार पर पदस्थापना की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी प्रक्रिया को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या कुछ लोगों ने इसे कथित रूप से कमाई का जरिया बना लिया है? चर्चा है कि शहर और शहर से लगे विद्यालयों में पदस्थापना पाने के लिए स्थानांतरित व्याख्याताओं से 30 से 50 हजार रुपए तक की मांग की जा रही है।सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिन विद्यालयों में पहले से शिक्षकों की पर्याप्त उपलब्धता है, वहां अतिरिक्त या सुविधाजनक पदस्थापना की कथित कोशिश क्यों की जा रही है? दूसरी ओर जिले के कई ग्रामीण और दूरस्थ विद्यालयों में शिक्षकों की कमी बनी हुई है। कहीं एक ही शिक्षक के भरोसे पूरी स्कूल व्यवस्था चल रही है, तो कहीं विषय विशेषज्ञों की कमी के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।एकल शिक्षकीय विद्यालयों की स्थिति सबसे चिंताजनक है। ऐसे विद्यालयों में एक शिक्षक को पढ़ाई कराने के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य, रिकॉर्ड संधारण, विद्यार्थियों की उपस्थिति, विभागीय ऑनलाइन कार्य और अन्य जिम्मेदारियां भी संभालनी पड़ती हैं। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना करना कठिन हो जाता है। सवाल यह है कि जब दूरस्थ विद्यालयों को शिक्षकों की सबसे अधिक आवश्यकता है, तब शहर और शहर से लगे क्षेत्रों में पदस्थापना के लिए कथित रूप से इतनी होड़ क्यों है?शिक्षा विभाग की पदस्थापना प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग इसलिए भी जरूरी है कि शासन के प्रशासनिक स्थानांतरण आदेश के बाद जिला स्तर पर किस आधार पर किस व्याख्याता को कौन-सा विद्यालय आवंटित किया गया, इसका स्पष्ट सार्वजनिक रिकॉर्ड होना चाहिए। प्रत्येक पदस्थापना का आधार, रिक्त पदों की स्थिति और विद्यालयों में उपलब्ध शिक्षकों की संख्या सार्वजनिक होने पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को इस मामले में तत्काल स्पष्टीकरण देना चाहिए कि क्या वास्तव में स्थानांतरित व्याख्याताओं से शहर या शहर से लगे विद्यालयों में पदस्थापना के लिए किसी प्रकार की राशि की मांग या वसूली की गई? यदि ऐसी शिकायतें हैं तो उनकी जांच क्यों नहीं हुई? और यदि आरोप निराधार हैं तो पदस्थापना प्रक्रिया का पूरा विवरण सार्वजनिक कर इन चर्चाओं पर विराम क्यों नहीं लगाया जा रहा?मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर बिलासपुर, संभागायुक्त, स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव और राज्य शासन को स्वतंत्र जांच करानी चाहिए। आरोपित प्रक्रिया में शामिल अधिकारी-कर्मचारियों की भूमिका की जांच के साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि स्थानांतरित व्याख्याताओं को किस मापदंड के आधार पर विद्यालय आवंटित किए गए।जनता और शिक्षा जगत का सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या शहर की सुविधाजनक पदस्थापना कथित लेन-देन से तय होगी और गांवों के एकल शिक्षकीय विद्यालय बच्चों के भविष्य के साथ भगवान भरोसे चलते रहेंगे? यदि आरोपों में सच्चाई है तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई आवश्यक है और यदि आरोप निराधार हैं तो विभाग को पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। जांच से ही इस कथित ‘पदस्थापना के खेल’ की वास्तविकता सामने आ सकेगी।



