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वन मंडल में कैम्पा सहित विभिन्न योजनाओं में कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप, मुख्यमंत्री तक पहुंची शिकायतें फिर भी कार्रवाई पर उठ रहे सवाल।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में वन विभाग से जुड़ी योजनाओं में कथित वित्तीय अनियमितताओं और शासकीय राशि के दुरुपयोग को लेकर शिकायतों का मामला अब शासन के स्तर तक पहुंचने के बावजूद कार्रवाई के सवालों में उलझता नजर आ रहा है। आरोप है कि बिलासपुर वन मंडल में कैम्पा सहित विभिन्न मदों से स्वीकृत कार्यों में नियमों की अनदेखी, कार्यों की गुणवत्ता, भुगतान प्रक्रिया, मापदंडों के पालन और शासकीय राशि के उपयोग को लेकर गंभीर शिकायतें सामने आई हैं। शिकायतकर्ताओं द्वारा इन मामलों की जांच और जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग उच्च स्तर तक किए जाने का दावा किया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद ठोस कार्रवाई सामने नहीं आने से विभागीय जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।कैम्पा योजना का उद्देश्य वन संरक्षण, क्षतिपूर्ति वनीकरण, वन क्षेत्र के विकास, जल संरक्षण, पौधरोपण और वन अधोसंरचना जैसे कार्यों के माध्यम से पर्यावरणीय संतुलन को मजबूत करना है। ऐसे में यदि इस मद से स्वीकृत राशि के उपयोग में अनियमितता होती है तो उसका सीधा असर वन संरक्षण और शासन की योजनाओं के वास्तविक क्रियान्वयन पर पड़ता है। यही वजह है कि बिलासपुर वन मंडल से संबंधित शिकायतों को केवल विभागीय स्तर की सामान्य शिकायत मानने के बजाय निष्पक्ष जांच के माध्यम से तथ्यों की पुष्टि किए जाने की मांग उठ रही है।इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शिकायतें मुख्यमंत्री सचिवालय और शासन के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंच चुकी हैं, तो उनकी वर्तमान स्थिति क्या है? क्या शिकायतों की विधिवत जांच कराई गई? यदि जांच हुई तो जांच अधिकारी कौन थे, जांच में क्या तथ्य सामने आए और उसकी रिपोर्ट पर क्या निर्णय लिया गया? यदि शिकायतों में कोई तथ्य नहीं पाया गया तो शिकायतकर्ताओं को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई? और यदि प्रथम दृष्टया अनियमितता सामने आई है तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? ये ऐसे सवाल हैं जिनका स्पष्ट जवाब सामने आना आवश्यक है।गौरतलब है कि प्रदेश के दूसरे वन मंडलों में कैम्पा मद में सामने आई वित्तीय अनियमितताओं पर जांच और वसूली की कार्रवाई का उदाहरण मौजूद है। विधानसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार जगदलपुर वन मंडल में कैम्पा मद से संबंधित वर्ष 2022-23 की शिकायतों की जांच के बाद करीब 1.39 करोड़ रुपये के अनियमित व्यय को अमान्य मानते हुए राशि जमा कराने की कार्रवाई की गई थी। संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई भी की गई। यह उदाहरण इस सवाल को और महत्वपूर्ण बनाता है कि बिलासपुर वन मंडल से संबंधित शिकायतों में भी यदि दस्तावेजी तौर पर वित्तीय अनियमितता के आरोप हैं तो उनकी स्वतंत्र और समयबद्ध जांच क्यों नहीं कराई जानी चाहिए।वहीं, शासन की ओर से वन क्षेत्रों की सुरक्षा और अवैध गतिविधियों के विरुद्ध कार्रवाई किए जाने की जानकारी लगातार सामने आती रही है। अप्रैल 2026 में बिलासपुर क्षेत्र के कोटा परियोजना मंडल में वन भूमि पर अवैध अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई की आधिकारिक जानकारी भी जारी की गई थी। इससे स्पष्ट है कि वन विभाग के पास क्षेत्रीय स्तर पर कार्रवाई करने की प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद है। ऐसे में वित्तीय और योजनागत शिकायतों पर भी उसी प्रकार पारदर्शी कार्रवाई की अपेक्षा स्वाभाविक है।बिलासपुर वन मंडल में कथित गड़बड़ियों को लेकर उठ रहे सवाल केवल किसी एक कार्य या एक अधिकारी तक सीमित नहीं हैं। शिकायतों में यदि अलग-अलग योजनाओं, अलग-अलग वर्षों और अलग-अलग कार्यों से संबंधित तथ्य दर्ज हैं तो प्रत्येक मामले की अलग-अलग तकनीकी और वित्तीय जांच आवश्यक होगी। कार्यस्थल का भौतिक सत्यापन, स्वीकृत राशि और वास्तविक व्यय का मिलान, माप पुस्तिका, भुगतान अभिलेख, बिल-वाउचर, सामग्री खरीदी, निविदा प्रक्रिया, कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र तथा संबंधित अधिकारियों की स्वीकृति जैसे दस्तावेजों की जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी वास्तविकता है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को केवल शिकायत के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता। आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही होनी चाहिए। लेकिन दूसरी ओर शिकायतों को लंबित रखना भी पारदर्शी प्रशासन की दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। यदि आरोप गलत हैं तो जांच के माध्यम से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए और यदि अनियमितता प्रमाणित होती है तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।अब निगाहें शासन और वन विभाग के अगले कदम पर टिकी हैं। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री स्तर तक पहुंची शिकायतों पर विभागीय स्तर पर क्या रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है? क्या किसी वरिष्ठ अधिकारी से स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? क्या शिकायतों में उल्लेखित कार्यों का स्थल निरीक्षण कराया जाएगा? क्या शासकीय राशि के भुगतान और वास्तविक कार्य के बीच मिलान कराया जाएगा? और यदि वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है तो क्या संबंधित राशि की वसूली के साथ जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय अथवा कानूनी कार्रवाई की जाएगी?बिलासपुर न्यायधानी है और यहां से शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर पूरे प्रदेश में संदेश जाता है। इसलिए वन विभाग की योजनाओं में खर्च होने वाली सार्वजनिक राशि के संबंध में उठे सवालों का समाधान भी पारदर्शी तरीके से होना चाहिए। शिकायत सही है या गलत—इसका फैसला जांच से होना चाहिए, फाइलों की खामोशी से नहीं। अब जरूरत इस बात की है कि शासन शिकायतों की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक करे, जांच की समयसीमा तय करे और यदि किसी स्तर पर अनियमितता प्रमाणित होती है तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय की जाए। इससे न केवल शिकायतकर्ताओं को जवाब मिलेगा, बल्कि कैम्पा सहित वन विभाग की योजनाओं में सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर जनता का भरोसा भी मजबूत होगा।

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