
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी संगठन का अपना एक अलग इतिहास रहा है। यहां भाजपा ने वर्षों तक संगठन को मजबूत करने वाले कई ऐसे नेताओं को तैयार किया, जिन्होंने पार्टी को जमीनी स्तर पर खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रदेश में विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद संगठन के अनुभवी चेहरों को लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा रही हैं।बिलासपुर भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्षों को मिली जिम्मेदारियां इस बात का संकेत हैं कि पार्टी अपने पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को सत्ता और संगठन के बीच बेहतर समन्वय के लिए आगे ला रही है।पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष राजा पाण्डेय को छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम का अध्यक्ष बनाया गया। वहीं पूर्व जिलाध्यक्ष भूपेंद्र सिंह सवन्नी को क्रेडा अध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली। इसी क्रम में पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष रजनीश सिंह को जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित बिलासपुर का अध्यक्ष बनाया गया।इन नियुक्तियों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि जब भाजपा संगठन के पुराने जिलाध्यक्षों को सरकार में स्थान दिया जा रहा है तो फिर एक और अनुभवी एवं लंबे समय तक संगठन की जिम्मेदारी संभाल चुके पूर्व जिलाध्यक्ष रामदेव कुमावत को अब तक कोई महत्वपूर्ण दायित्व क्यों नहीं मिला है?संगठन के संघर्षशील चेहरे रहे हैं रामदेव कुमावतरामदेव कुमावत भाजपा के उन नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाई। भाजपा की राजनीति में संगठनात्मक अनुभव, कार्यकर्ताओं के बीच पकड़ और लंबे समय तक पार्टी के लिए काम करने वाले नेताओं को समय-समय पर सरकार में प्रतिनिधित्व दिया जाता रहा है।ऐसे में उनके समर्थकों और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि आखिर वह कौन सा कारण है जिसके चलते संगठन के अन्य पूर्व जिलाध्यक्षों को जिम्मेदारी मिलने के बाद भी रामदेव कुमावत अभी तक प्रतीक्षा सूची में हैं।क्या है राजनीतिक समीकरण?राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरकार में नियुक्तियां केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं बल्कि क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक समीकरण और संगठन की आवश्यकता को ध्यान में रखकर की जाती हैं। कई बार अनुभवी नेताओं को उचित समय और उपयुक्त जिम्मेदारी के लिए प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है।लेकिन बिलासपुर जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिले में जब एक ही संगठन के कई पूर्व अध्यक्षों को संवैधानिक और महत्वपूर्ण संस्थाओं में स्थान मिलता है तो स्वाभाविक रूप से अन्य वरिष्ठ नेताओं को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है।कार्यकर्ताओं की निगाहें अब सरकार के अगले फैसले परभाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच यह भावना भी है कि पार्टी ने हमेशा समर्पित और संघर्षशील कार्यकर्ताओं को सम्मान दिया है। ऐसे में रामदेव कुमावत जैसे वरिष्ठ नेता, जिन्होंने लंबे समय तक संगठन को समय दिया, उनके अनुभव का उपयोग सरकार किस रूप में करती है, यह देखने वाली बात होगी।आने वाले समय में यदि सरकार संगठन के अन्य अनुभवी नेताओं को भी जिम्मेदारी देती है तो उसमें रामदेव कुमावत का नाम सबसे अधिक चर्चा में रहने वालों में शामिल हो सकता है।फिलहाल बिलासपुर की राजनीतिक चौपालों में एक ही सवाल गूंज रहा है—”जब भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्षों को सत्ता में सम्मान मिला, तो संगठन के पुराने सिपाही रामदेव कुमावत की बारी कब आएगी?”यह सवाल केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति का नहीं, बल्कि उन हजारों कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं से जुड़ा है जो वर्षों तक संगठन के लिए निष्ठा और समर्पण के साथ काम करते रहे हैं।



