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कुटुंब न्यायालय के अंतरिम आदेश के बाद दुष्कर्म मुकदमे पर उठे अहम विधिक सवाल…मुख्य न्यायाधीश को भेजे निवेदन में न्यायिक सामंजस्य पर उठाए गए महत्वपूर्ण प्रश्न।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा के समक्ष एक विचाराधीन प्रकरण को लेकर ऐसा निवेदन प्रस्तुत किया गया है, जिसने एक ही संबंध से जुड़े दो अलग-अलग न्यायिक मंचों पर चल रही कार्यवाहियों के बीच विधिक सामंजस्य को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

यह मामला अब केवल एक व्यक्ति के निजी विवाद तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया और विधिक सिद्धांतों की दृष्टि से भी चर्चा का विषय बन सकता है।

निवेदन में कहा गया है कि संबंधित प्रकरण में एक ओर कुटुंब न्यायालय ने अंतरिम भरण-पोषण संबंधी आदेश पारित करते हुए प्रथम दृष्टया दोनों पक्षों के लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहने के तथ्य को आधार माना, वहीं दूसरी ओर उसी संबंध के आधार पर दर्ज दुष्कर्म का आपराधिक मामला वर्तमान में सक्षम न्यायालय में विचाराधीन है।आवेदनकर्ता का कहना है कि उसने पिछले लगभग तेरह वर्षों में संबंधित महिला द्वारा कथित ब्लैकमेलिंग, धन की मांग, मकान बनवाने के दबाव तथा झूठे आपराधिक प्रकरण में फँसाने की धमकियों के संबंध में कई शिकायतें पुलिस को दी थीं, लेकिन उन पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इसके विपरीत, महिला की शिकायत पर पुलिस ने तत्काल एफआईआर दर्ज कर ली, जिसके आधार पर दुष्कर्म सहित अन्य धाराओं में आपराधिक मुकदमा चल रहा है। इन आरोपों की सत्यता अथवा असत्यता का अंतिम निर्णय संबंधित आपराधिक न्यायालय द्वारा किया जाना शेष है।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा को भेजे गए निवेदन में यह प्रश्न उठाया गया है कि यदि किसी न्यायिक आदेश में दोनों पक्षों के लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहने का प्रथम दृष्टया उल्लेख किया गया है, तो उसी संबंध से जुड़े दुष्कर्म के आरोपों का परीक्षण आपराधिक न्यायालय किन विधिक सिद्धांतों और साक्ष्यों के आधार पर करेगा।

आवेदनकर्ता ने यह भी कहा है कि उसका उद्देश्य किसी न्यायालय के आदेश पर टिप्पणी करना या किसी पक्ष को दोषी अथवा निर्दोष घोषित करना नहीं है, बल्कि केवल न्यायिक प्रक्रिया में विधिक सामंजस्य को समझना है।

निवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि देश के विभिन्न मामलों में उच्चतम न्यायालय ने दीर्घकालीन सहजीवन (लिव-इन रिलेशनशिप) और विवाह के वादे से जुड़े मामलों में परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं। हालांकि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके अपने तथ्यों, साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।

आवेदनकर्ता ने मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा से अनुरोध किया है कि यदि न्यायिक मर्यादाओं और विधि के अनुरूप उचित समझा जाए, तो इस प्रकार की परिस्थितियों में उत्पन्न विधिक प्रश्नों और न्यायिक सामंजस्य के पहलुओं पर विचार किया जाए, ताकि न्याय व्यवस्था के प्रति आम नागरिक का विश्वास और अधिक सुदृढ़ हो सके।

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