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आदिवासी ज्ञान से किशोर विकास की नई दिशा तलाशेगा छत्तीसगढ़, ‘मूल मंथन’ कार्यशाला का रायपुर में शुभारंभ।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ शासन के आदिम जाति विकास विभाग एवं यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को राजधानी रायपुर में ‘मूल मंथन : आदिवासी ज्ञान से किशोरावस्था की पुनर्कल्पना’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय क्षेत्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। कार्यशाला का उद्देश्य जनजातीय समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक मूल्यों को आधुनिक विकास योजनाओं से जोड़ते हुए किशोरों के समग्र विकास के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करना है।कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने कहा कि जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपराएं और स्थानीय ज्ञान केवल उनकी पहचान ही नहीं, बल्कि सतत एवं समावेशी विकास की मजबूत आधारशिला हैं। उन्होंने कहा कि विकास की प्रक्रिया तभी सार्थक होगी जब जनजातीय समुदायों को उनकी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रखते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, कौशल विकास और अन्य शासकीय योजनाओं का समान एवं प्रभावी लाभ मिल सके।उन्होंने कहा कि कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और जनजातीय प्रतिनिधियों से प्राप्त सुझावों के आधार पर ऐसी विकास रणनीतियां तैयार की जाएंगी, जो समुदाय आधारित होने के साथ-साथ स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप भी हों। इन रणनीतियों के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों में किशोरों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, मानसिक विकास तथा सामाजिक सशक्तिकरण को नई दिशा देने का प्रयास किया जाएगा।कार्यशाला में किशोरावस्था से जुड़े विभिन्न आयामों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया जा रहा है। इसमें जनजातीय समाज की पारंपरिक जीवनशैली, स्थानीय ज्ञान, सामाजिक संरचना तथा सांस्कृतिक मूल्यों को आधुनिक नीतियों के साथ समन्वित करने पर विशेष बल दिया जा रहा है, ताकि विकास योजनाएं अधिक प्रभावी, व्यवहारिक और समुदाय के अनुकूल बन सकें।इस अवसर पर राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा, यूनिसेफ के प्रतिनिधि, विभिन्न क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञ, नीति-निर्माता, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता एवं जनजातीय समुदाय के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। सभी ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि जनजातीय समाज के अनुभव, परंपरागत ज्ञान और सामुदायिक सहभागिता को विकास योजनाओं का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की पहल से न केवल जनजातीय किशोरों के जीवन स्तर में सुधार आएगा, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखते हुए उन्हें आत्मविश्वासी, शिक्षित और स्वस्थ नागरिक के रूप में विकसित करने में भी मदद मिलेगी। कार्यशाला से निकलने वाले निष्कर्ष भविष्य में राज्य की जनजातीय विकास नीतियों और किशोर कल्याण कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।

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