
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
लोक शिक्षण संचालनालय छत्तीसगढ़ में पदस्थ उप संचालक अशोक नारायण बंजारा केवल एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में ही नहीं, बल्कि शिक्षा, लोक कला, लोक संगीत और संस्कृति के सशक्त संवाहक के रूप में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। शिक्षा को केवल किताबों और पाठ्यक्रम तक सीमित न रखते हुए वे लोक परंपराओं, कला और संगीत के माध्यम से ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के प्रयास में जुटे है।
छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति में गीत, संगीत, नृत्य और लोक कथाओं का विशेष महत्व है। अशोक नारायण बंजारा मानते हैं कि शिक्षा तभी प्रभावी बनती है जब उसमें स्थानीय संस्कृति और समाज की भावनाओं का समावेश हो। यही सोच उन्हें एक अलग पहचान देती है। वे अधिकारी की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ लोक कलाकार की भूमिका भी निभा रहे हैं।उनके लिए लोक कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने, संस्कार देने और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम है। लोक संगीत के जरिए वे छत्तीसगढ़ की परंपराओं, भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं।
शिक्षा विभाग में प्रशासनिक दायित्वों के बीच लोक संस्कृति के प्रति उनका समर्पण यह संदेश देता है कि एक अधिकारी केवल फाइलों तक सीमित नहीं होता, बल्कि समाज निर्माण में अपनी रचनात्मक भूमिका भी निभा सकता है। लोक शिक्षण संचालनालय राज्य की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा प्रमुख विभाग है, जहां ऐसे प्रयास शिक्षा को अधिक जीवंत और प्रभावी बनाने में सहायक हो सकते हैं।
आज जब आधुनिक शिक्षा में तकनीक और प्रतियोगिता का दबाव बढ़ रहा है, तब लोक कला और संस्कृति के माध्यम से शिक्षा को जोड़ने वाले प्रयास बच्चों में अपनी पहचान, भाषा और विरासत के प्रति गौरव पैदा करते हैं।अशोक नारायण बंजारा की पहचान अब केवल एक उप संचालक तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वे शिक्षा के साथ लोक संस्कृति के प्रहरी और लोक कला के साधक के रूप में भी अपनी छाप छोड़ रहे हैं।




