
विकास नंद/ सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की अपनी पहचान, संस्कृति और लोकजीवन से गहराई से जुड़ी छत्तीसगढ़ी भाषा को स्कूली शिक्षा में अपेक्षित महत्व नहीं मिलने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सरायपाली विकासखंड के अंतर्गत संचालित विभिन्न शासकीय स्कूलों में छत्तीसगढ़ी भाषा की पढ़ाई और इसके प्रति विद्यार्थियों में रुचि विकसित करने की स्थिति को लेकर अभिभावकों और स्थानीय लोगों में चिंता देखी जा रही है।
सरायपाली क्षेत्र ओडिशा की सीमा से लगा हुआ है।
ऐसे में यहां के कुछ स्कूलों में पड़ोसी राज्य की ओड़िया भाषा का अध्ययन विद्यार्थियों को कराया जा रहा है। दूसरी ओर, स्थानीय स्तर पर छत्तीसगढ़ी भाषा के शिक्षण को लेकर अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं देने की शिकायत सामने आ रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि दूसरी भाषा सीखना ज्ञान के विस्तार के लिए उपयोगी है, लेकिन इसके साथ अपनी स्थानीय भाषा और संस्कृति के संरक्षण को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
अपनी भाषा से दूरी चिंता का विषय
छत्तीसगढ़ी केवल बातचीत का माध्यम नहीं, बल्कि प्रदेश की लोकसंस्कृति, परंपरा, लोकगीत, लोककथाओं और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में यदि स्कूल स्तर पर ही बच्चों को अपनी भाषा से पर्याप्त रूप से नहीं जोड़ा गया तो आने वाली पीढ़ियों में स्थानीय भाषा के प्रति रुचि और व्यवहारिक उपयोग प्रभावित होने की आशंका है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि बच्चों को ओड़िया भाषा का ज्ञान मिलना अच्छी बात है, लेकिन अपनी छत्तीसगढ़ी भाषा की कीमत पर नहीं। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण ओड़िया भाषा का व्यावहारिक महत्व अपनी जगह है, मगर स्कूलों में स्थानीय भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए भी समान गंभीरता जरूरी है।
स्कूलों में भाषा शिक्षा की वास्तविक स्थिति की जांच जरूरी
सरायपाली विकासखंड में कितने स्कूलों में छत्तीसगढ़ी भाषा पढ़ाई जा रही है, कितने स्कूलों में ओड़िया भाषा का शिक्षण हो रहा है, इसके लिए कितने शिक्षक उपलब्ध हैं और शासन के संबंधित निर्देशों का किस स्तर तक पालन किया जा रहा है—इन बिंदुओं की स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है।स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा विभाग को विकासखंड के सभी स्कूलों की भाषा-वार स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए। यदि कहीं छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए निर्धारित व्यवस्था होने के बावजूद उसका पालन नहीं हो रहा है, तो संबंधित स्तर पर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
भाषा के साथ संस्कृति और पहचान का भी सवाल
छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण को केवल पाठ्यक्रम का विषय मानना पर्याप्त नहीं होगा। भाषा के माध्यम से ही बच्चे अपने क्षेत्र की लोकपरंपराओं, संस्कृति और सामाजिक इतिहास से जुड़ते हैं। इसलिए स्कूलों में छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर गतिविधियां, पठन-पाठन, स्थानीय साहित्य, लोककथाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है।स्थानीय लोगों का कहना है कि छत्तीसगढ़ की धरती पर पढ़ने वाले बच्चों को अपनी भाषा का सम्मान और ज्ञान मिलना चाहिए। दूसरी भाषाओं का अध्ययन शिक्षा का विस्तार है, लेकिन अपनी भाषा की उपेक्षा सांस्कृतिक दृष्टि से गंभीर विषय बन सकता है।
शिक्षा विभाग से स्पष्टता की मांग
सरायपाली क्षेत्र में उठ रहे इस मुद्दे के बीच अब शिक्षा विभाग से यह स्पष्ट करने की मांग की जा रही है कि विकासखंड के स्कूलों में छत्तीसगढ़ी भाषा के शिक्षण के संबंध में शासन के क्या निर्देश हैं और उनका कितना पालन हो रहा है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन स्कूलों में ओड़िया भाषा पढ़ाई जा रही है और वहां इसके लिए किस प्रकार की शैक्षणिक व्यवस्था की गई है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि छत्तीसगढ़ी भाषा को उसका उचित स्थान दिलाना केवल भाषा का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का दायित्व भी है। सरकार और शिक्षा विभाग को इस दिशा में गंभीरता से समीक्षा कर आवश्यक कदम उठाने चाहिए।




