
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
बिलासपुर संभाग अंर्तगत गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में पदस्थ कुछ पटवारियों की कार्यप्रणाली को लेकर ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के बीच असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि पटवारी जिन गांवों और हल्कों में पदस्थ हैं, वहां नियमित रूप से आम जनता की समस्याएं सुनने और राजस्व संबंधी कार्यों का निराकरण करने के बजाय उनका अधिकांश काम बिचौलियों और निजी संपर्क रखने वाले लोगों के माध्यम से कराया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन सोशल मीडिया और जनचर्चाओं में सामने आ रही शिकायतों ने जिले की राजस्व व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।ग्रामीणों का कहना है कि गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला शांतिप्रिय क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में आदिवासी, गरीब, किसान और विभिन्न समाजों के लोग निवास करते हैं। ऐसे में आम नागरिकों को अपने भूमि रिकॉर्ड, नामांतरण, सीमांकन, नक्शा, बंटवारा और अन्य राजस्व कार्यों के लिए अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े, यह सुनिश्चित करना जिला प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।शिकायत करने वाले लोगों का आरोप है कि कुछ पटवारी अपने हल्कों में आम जनता की पहुंच से दूर रहते हैं, जबकि उनके आसपास चार-पांच ऐसे लोग हमेशा सक्रिय रहते हैं, जिनके माध्यम से राजस्व कार्यालय तक पहुंच और काम कराने की व्यवस्था संचालित होने की बात कही जा रही है। आरोप यहां तक लगाए जा रहे हैं कि आम नागरिक सीधे पटवारी से संपर्क करने में असहज महसूस करता है, लेकिन बिचौलियों के माध्यम से संपर्क करने पर काम जल्दी आगे बढ़ने की उम्मीद दिखाई जाती है।ग्रामीणों का कहना है कि आज व्हाट्सएप के माध्यम से अनेक राजस्व संबंधी कार्यों और दस्तावेजों की जानकारी का आदान-प्रदान हो रहा है, लेकिन गरीब, ग्रामीण और तकनीकी संसाधनों से वंचित लोगों की शिकायतें और फोन तक अनसुने रह जाने की बात सामने आती है। कई पंचायतों में पटवारी कार्यालय या बैठने की व्यवस्था होने के बावजूद नियमित समय पर उपलब्धता नहीं होने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि गरीब और दूरदराज गांव का व्यक्ति सीधे अपने पटवारी तक नहीं पहुंच सकता तो फिर वह अपनी समस्या लेकर आखिर किसके पास जाए?सबसे गंभीर आरोप शासकीय भूमि से जुड़े मामलों को लेकर सामने आ रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, कुछ मामलों में सरकारी जमीन पर नामांतरण, कब्जे अथवा अन्य राजस्व कार्यों को लेकर अवैध लेन-देन की चर्चा होती रहती है। हालांकि इन आरोपों की प्रशासनिक जांच होना बाकी है, लेकिन लोगों का कहना है कि यदि कहीं भी ऐसे मामलों में अनियमितता हो रही है तो कलेक्टर स्तर से निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।जिले में सरकारी जमीनों पर कब्जे और आवास निर्माण को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। राजस्व विभाग की जानकारी और अनुमति के बिना शासकीय भूमि पर निर्माण कैसे हो रहा है? वन भूमि और जंगलों पर कथित कब्जों की शिकायतों पर वन विभाग की कार्रवाई कहां है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजस्व और वन विभाग दोनों की जिम्मेदारी तय किए बिना ऐसे मामलों पर रोक संभव नहीं है।मामले में चुने हुए जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। जनपद सदस्य से लेकर जिला पंचायत सदस्य, विधायक और सांसद तक क्षेत्र की समस्याओं से अवगत होने के बावजूद यदि किसी क्षेत्र की जनता को एक पटवारी से मिलने और अपना काम कराने के लिए बिचौलियों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर विफलता है।जिले के प्रशासनिक नेतृत्व पर भी सवाल उठाते हुए स्थानीय लोगों ने कहा कि बार-बार अधिकारियों के स्थानांतरण और प्रशासनिक बदलाव से दीर्घकालिक जवाबदेही प्रभावित होती है। सवाल यह है कि जिला केवल राजनीतिक गतिविधियों और प्रशासनिक पदस्थापन के लिए बनाया गया है या फिर आम जनता के विकास, सुशासन, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और गरीबों को न्याय दिलाने के लिए?स्थानीय लोगों ने गौरेला-पेंड्रा-मरवाही कलेक्टर से विशेष पहल करने की मांग की है। उनका कहना है कि जिले के सभी पटवारियों की बैठक बुलाकर स्पष्ट निर्देश दिए जाएं कि वे अपने-अपने हल्कों और पंचायतों में नियमित रूप से उपस्थित रहें, जनता से सीधे मिलें, फोन और शिकायतों का जवाब दें तथा किसी भी प्रकार के बिचौलिया तंत्र को राजस्व कार्यों से दूर रखा जाए। साथ ही प्रत्येक हल्के में निर्धारित जनसुनवाई दिवस और पटवारी की उपस्थिति का स्पष्ट कार्यक्रम सार्वजनिक किया जाना चाहिए।लोगों का कहना है कि शासन की योजनाएं गरीबों और जरूरतमंदों के लिए बनाई जाती हैं। यदि वही गरीब व्यक्ति अपनी जमीन के कागज, नामांतरण या छोटे से राजस्व काम के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है, तो शासन की मंशा धरातल पर कमजोर पड़ जाती है। प्रशासन को चाहिए कि वह शिकायतों को केवल कागजी कार्रवाई न समझे, बल्कि वास्तविक स्थिति की जांच कर दोषी पाए जाने वाले लोगों पर कार्रवाई करे।स्थानीय लोगों ने राजस्व और वन विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों से भी अपील की है कि वे ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ काम करें। भ्रष्टाचार से अर्जित धन से भले ही कुछ समय के लिए व्यक्तिगत लाभ हो जाए, लेकिन गरीब और जरूरतमंदों को परेशान करने की कीमत अंततः समाज और व्यवस्था को चुकानी पड़ती है। जनता का कहना है कि सरकारी पद जनता की सेवा के लिए है, निजी लाभ या बिचौलियों के माध्यम से व्यवस्था चलाने के लिए नहीं।अब देखने वाली बात यह होगी कि गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला प्रशासन इन गंभीर शिकायतों और जनचर्चाओं को किस स्तर पर लेता है तथा क्या कलेक्टर जिले के सभी पटवारियों, राजस्व अधिकारियों और संबंधित विभागों की विशेष बैठक लेकर जनता की सीधी सुनवाई और जवाबदेही सुनिश्चित करने की पहल करते हैं। फिलहाल जिले में यही सवाल गूंज रहा है—पटवारी जनता के लिए हैं या जनता को पटवारी तक पहुंचने के लिए बिचौलियों का सहारा लेना पड़ेगा?



