
विकास नंद/ सर्वव्यापी
सरायपाली। प्रदेश में भाजपा सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर ‘सेवा संकल्प’ के माध्यम से जनसेवा और सुशासन का संदेश दे रही है। वहीं दूसरी ओर सरायपाली की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवाल इस अभियान के जमीनी असर पर सवाल खड़े कर रहे हैं। करीब 16 वर्ष पहले 100 बिस्तर अस्पताल की सौगात मिलने के बावजूद क्षेत्रवासियों को विशेषज्ञ चिकित्सकों, पर्याप्त संसाधनों और बेहतर उपचार सुविधाओं के लिए अब भी इंतजार करना पड़ रहा है।
2011 में मिली 100 बेड की सौगात
5 जून 2011 को तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सरायपाली क्षेत्र को 100 बिस्तर अस्पताल की सौगात दी थी। उस समय क्षेत्रवासियों को उम्मीद थी कि अस्पताल के विस्तार से गंभीर मरीजों को उपचार के लिए महासमुंद, रायपुर या दूसरे बड़े शहरों का रुख नहीं करना पड़ेगा। विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता, आधुनिक उपकरण और बेहतर जांच सुविधाओं से स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत होने की उम्मीद थी।लेकिन वर्षों बाद भी अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि 100 बिस्तरों की घोषणा और क्षमता के अनुरूप जिस स्तर की स्वास्थ्य सुविधा अपेक्षित थी, वह धरातल पर पूरी तरह दिखाई नहीं दे रही है। करीब 30 बिस्तरों में सीमित संचालन का दावा भी क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
‘सेवा संकल्प’ और स्वास्थ्य व्यवस्था आमने-सामने
एक ओर भाजपा सरकार सेवा, सुशासन और जनकल्याण को प्राथमिकता बताते हुए ‘सेवा संकल्प’ अभियान चला रही है, वहीं दूसरी ओर सरायपाली के सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों और आवश्यक संसाधनों की कमी का मुद्दा सामने आ रहा है।क्षेत्रवासियों का कहना है कि जनसेवा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बेहतर स्वास्थ्य सुविधा है। यदि गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीज को सरकारी अस्पताल से दूसरे शहर या निजी अस्पताल की ओर जाना पड़े और इलाज पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़े, तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर इसका सीधा आर्थिक असर पड़ता है।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी बनी बड़ी चुनौती
सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियमित उपलब्धता को लेकर भी लंबे समय से मांग उठती रही है। गंभीर मरीजों को बेहतर उपचार के लिए रेफर किए जाने की स्थिति में मरीजों के साथ उनके परिजनों को भी आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
विशेषकर ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले मरीजों के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक दौड़ लगाना आसान नहीं होता। आने-जाने का खर्च, जांच का खर्च और निजी अस्पताल में उपचार की बढ़ती लागत गरीब परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है।
अस्पताल की इमारत नहीं, पूरी व्यवस्था चाहिए
क्षेत्रवासियों की मांग है कि सरायपाली को केवल 100 बिस्तर की घोषणा या अस्पताल भवन तक सीमित स्वास्थ्य सुविधा नहीं, बल्कि उसके अनुरूप पूरी चिकित्सा व्यवस्था मिलनी चाहिए।इसमें विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियमित पदस्थापना, पर्याप्त नर्सिंग स्टाफ, आधुनिक चिकित्सा उपकरण, आवश्यक जांच सुविधाएं, दवाओं की उपलब्धता और गंभीर मरीजों के उपचार की समुचित व्यवस्था शामिल है।
जनप्रतिनिधियों से भी जवाब की अपेक्षा
स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर क्षेत्र में उठ रहे सवालों के बीच अब शासन और जनप्रतिनिधियों से स्पष्ट जवाब की अपेक्षा की जा रही है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि यदि अस्पताल को 100 बिस्तरों की क्षमता के अनुरूप विकसित किया गया है तो वहां स्वीकृत और कार्यरत पदों, उपलब्ध बेड, विशेषज्ञ चिकित्सकों तथा चिकित्सा उपकरणों की स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए।लोगों का कहना है कि चुनाव के दौरान स्वास्थ्य सुविधा का मुद्दा प्रमुखता से उठता है, लेकिन चुनाव के बाद इस दिशा में अपेक्षित गति दिखाई नहीं देती। अब जरूरत घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस और समयबद्ध कार्रवाई की है।
16 साल बाद सवाल वही—100 बेड की पूरी सुविधा कब?
2011 में मिली 100 बिस्तर अस्पताल की सौगात को करीब 16 वर्ष बीत चुके हैं। इतने लंबे समय के बाद भी यदि क्षेत्र के मरीजों को गंभीर उपचार के लिए निजी अस्पतालों या बड़े शहरों का रुख करना पड़ रहा है, तो स्वास्थ्य व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है।‘सेवा संकल्प’ की चर्चा के बीच सरायपाली के लोगों का सवाल सीधा है—जब अस्पताल 100 बिस्तरों के लिए है तो उसकी पूरी क्षमता के अनुरूप डॉक्टर, स्टाफ, उपकरण और उपचार सुविधाएं कब उपलब्ध होंगी?
आमजन की अपेक्षा भी स्पष्ट है—सियासत बाद में, स्वास्थ्य सुविधा पहले। बीमारी न चुनाव देखती है और न राजनीतिक घोषणा। मरीज को चाहिए समय पर, सुलभ और सम्मानजनक उपचार।



