
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है। यदि मुख्यमंत्री सचिवालय से जारी पत्रों और वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के निर्देशों का पालन स्वयं मुख्यमंत्री के अधीन आने वाला स्कूल शिक्षा विभाग नहीं करता और यह संदेश दिया जाता है कि “शिक्षा मंत्री के आदेश के बिना कोई कार्य नहीं होगा”, तो यह केवल विभागीय असहमति का मामला नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की कार्यशैली पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
प्राप्त जानकारी और सामने आ रहे आरोपों के अनुसार मुख्यमंत्री सचिवालय से वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा भेजे गए कुछ पत्रों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि विभागीय स्तर पर यह कहा गया कि शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव की स्वीकृति अथवा निर्देश के बिना कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा। यदि ऐसा वास्तव में हुआ है, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही, अधिकारों के निर्धारण और शासन की निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर बहस का विषय बन सकता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुख्यमंत्री सचिवालय शासन का सर्वोच्च समन्वय केंद्र माना जाता है। यहां से जारी निर्देशों का उद्देश्य विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना और जनहित के मामलों में त्वरित निर्णय सुनिश्चित करना होता है। ऐसे में यदि मुख्यमंत्री सचिवालय के पत्रों की अनदेखी की जाती है या उन्हें महत्व नहीं दिया जाता, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर शासन की अंतिम प्रशासनिक जवाबदेही किसके पास है।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी इस विषय को लेकर चर्चा तेज है। जानकारों का मानना है कि यदि किसी विभाग में मंत्री और मुख्यमंत्री सचिवालय के निर्देशों के बीच टकराव की स्थिति बनती है, तो उसका समाधान शासन स्तर पर स्पष्ट रूप से होना चाहिए। अन्यथा इससे न केवल प्रशासनिक अनुशासन प्रभावित होता है, बल्कि अधिकारियों के बीच भी भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।विपक्ष को भी इस पूरे मामले में सरकार को घेरने का अवसर मिल सकता है।
यदि मुख्यमंत्री सचिवालय के निर्देशों की अनदेखी के आरोप सही साबित होते हैं, तो विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि क्या राज्य में समानांतर निर्णय प्रणाली संचालित हो रही है, जहां मुख्यमंत्री सचिवालय की अपेक्षा विभागीय मंत्री के निर्देशों को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि वास्तव में मुख्यमंत्री सचिवालय के वरिष्ठ अधिकारियों के पत्र प्रभावहीन हो गए हैं, तो शासन को इस पर स्पष्ट स्थिति रखनी चाहिए। यह भी आवश्यक है कि सरकार बताए कि मुख्यमंत्री सचिवालय और विभागीय मंत्रियों के अधिकारों एवं निर्णय प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति क्या है, ताकि भविष्य में ऐसी किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो।
हालांकि, इस पूरे मामले में स्कूल शिक्षा विभाग अथवा शिक्षा मंत्री की ओर से आधिकारिक पक्ष सामने आना भी उतना ही आवश्यक है। निष्पक्ष पत्रकारिता के दृष्टिकोण से संबंधित पक्ष का जवाब इस विषय पर महत्वपूर्ण होगा। यदि विभाग इन आरोपों का खंडन करता है या कोई प्रशासनिक कारण बताता है, तो उसे भी समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।




