
विकास नंद, सर्वव्यापी

देश की राजनीति इन दिनों लोकतंत्र बचाने और लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर एक नए राजनीतिक संघर्ष के दौर से गुजर रही है। एक तरफ विपक्षी दल लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनाव प्रक्रिया और संवैधानिक व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी तरफ सत्तारूढ़ भाजपा विपक्ष के आरोपों और उसके आंदोलनों का राजनीतिक जवाब देने में जुटी है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ जनता के बीच पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस राजनीतिक खींचतान के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दे आखिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र से बाहर क्यों होते जा रहे हैं? जिस जनता के समर्थन से सरकारें बनती हैं और विपक्ष को अपनी राजनीतिक ताकत मिलती है, उसी जनता की समस्याएं आज राजनीतिक बहस में अपेक्षित जगह नहीं बना पा रही हैं। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आर्थिक बदहाली, युवाओं का भविष्य, छोटे व्यापारियों की चुनौतियां और आम परिवारों का बिगड़ता बजट जैसे सवाल राजनीतिक नारों और प्रदर्शनों के बीच कहीं पीछे छूटते दिखाई दे रहे हैं।
लोकतंत्र बचाने की आवाज, लेकिन जनता के सवालों का जवाब कौन देगा?
लोकतंत्र किसी भी देश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था है। स्वतंत्र चुनाव, निष्पक्ष संस्थाएं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकार से सवाल पूछने का अधिकार लोकतंत्र की बुनियादी पहचान हैं। इसलिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर उठने वाले सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।लेकिन लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल राजनीतिक दलों के बीच सत्ता और विपक्ष की लड़ाई नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि आम नागरिक को रोजगार मिले, किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले, गरीब को महंगाई से राहत मिले और युवाओं को अपने भविष्य के लिए भटकना न पड़े।विपक्ष का लोकतंत्र बचाने का आंदोलन अपनी जगह है, लेकिन जनता यह भी जानना चाहती है कि महंगाई, बेरोजगारी और किसानों के नुकसान जैसे मुद्दों पर विपक्ष का ठोस वैकल्पिक कार्यक्रम क्या है?इसी तरह सत्ता पक्ष को भी केवल विपक्ष के आरोपों का राजनीतिक जवाब देने के बजाय जनता के सवालों का जवाब देना होगा। सरकार की जवाबदेही केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं हो सकती। जनता के प्रति जवाबदेही प्रतिदिन और हर परिस्थिति में जरूरी है।
दीपावली का त्योहार, लेकिन परिवारों के बजट पर महंगाई का दबाव
दीपावली देश का सबसे बड़ा और व्यापक रूप से मनाया जाने वाला त्योहार है। इस पर्व के साथ बाजारों में रौनक, घरों में खुशियां और परिवारों में उत्साह दिखाई देता है। लेकिन त्योहार की खुशियों के बीच आम परिवारों के सामने खर्च का हिसाब भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।खाद्य सामग्री, घरेलू जरूरतों, कपड़ों, मिठाइयों, परिवहन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों का दबाव परिवारों के मासिक बजट को प्रभावित करता है।
सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2026 में देश की खुदरा महंगाई दर 5.54 प्रतिशत और खाद्य महंगाई दर 7.74 प्रतिशत दर्ज की गई। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 8.06 प्रतिशत रही। ये आंकड़े बताते हैं कि घरेलू खर्च के मोर्चे पर विशेष रूप से ग्रामीण परिवारों के सामने दबाव बना हुआ है।ऐसे में सवाल उठता है कि राजनीतिक दलों के आंदोलन और रैलियों में आम आदमी की रसोई का मुद्दा कितनी प्रमुखता से उठ रहा है?आम परिवार को लोकतंत्र की बहस से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उसकी अपेक्षा है कि लोकतंत्र की मजबूती के साथ उसकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो।
अर्नब चक्रवात की मार: किसान की मेहनत पर मौसम का कहर
राजनीतिक गतिविधियों के बीच किसानों की चिंता एक अलग ही गंभीर विषय है। अर्नब चक्रवात से प्रभावित क्षेत्रों में बेमौसम बारिश और फसलों को हुए नुकसान ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।खेतों में महीनों की मेहनत और निवेश के बाद जब फसल तैयार होने की स्थिति में पहुंचती है, तब प्राकृतिक आपदा किसानों के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर देती है।धान, सब्जियों और अन्य फसलों को नुकसान होने से किसानों की आय प्रभावित होती है। खेती के लिए लिया गया कर्ज, खाद-बीज की लागत, मजदूरी और आगामी कृषि सीजन की तैयारी का खर्च भी उनके सामने चुनौती बन जाता है।छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में यह समस्या और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां बड़ी आबादी की आजीविका खेती और उससे जुड़े व्यवसायों पर निर्भर है।चक्रवात प्रभावित किसानों के लिए फसल क्षति का निष्पक्ष सर्वेक्षण, बीमा दावों का समयबद्ध भुगतान और पात्र किसानों को राहत राशि उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए।मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी चक्रवात प्रभावित किसानों की फसल क्षति का तत्काल सर्वेक्षण कराकर पात्र किसानों तक सहायता पहुंचाने के निर्देश दिए हैं।लेकिन वास्तविक परीक्षा निर्देश जारी करने में नहीं, बल्कि प्रभावित किसान के खाते तक समय पर राहत पहुंचाने में है।राजनीतिक दलों को भी इस विषय पर आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर किसानों के हित में ठोस पहल करनी चाहिए।
बेरोजगारी: युवाओं के सपनों और भविष्य का सवाल
देश का युवा रोजगार, बेहतर अवसर और सुरक्षित भविष्य चाहता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के सामने सरकारी नौकरियों की सीमित उपलब्धता, भर्ती प्रक्रिया में देरी और निजी क्षेत्र में स्थायी रोजगार की चुनौती बनी हुई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2026 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की समग्र बेरोजगारी दर 5 प्रतिशत रही। शहरी क्षेत्रों में यह दर 6.9 प्रतिशत दर्ज की गई।इन आंकड़ों को रोजगार की पूरी तस्वीर नहीं माना जा सकता, क्योंकि रोजगार की गुणवत्ता, नियमित आय, नौकरी की सुरक्षा और युवाओं की अपेक्षाओं का भी अलग महत्व है।
युवा केवल बेरोजगारी के आंकड़े नहीं देखना चाहता। वह यह जानना चाहता है कि उसके लिए नए रोजगार के अवसर कब पैदा होंगे? स्थानीय स्तर पर उद्योग और व्यवसाय कब बढ़ेंगे? कौशल प्रशिक्षण के बाद रोजगार की गारंटी जैसी व्यवस्थाएं कितनी प्रभावी होंगी?राजनीतिक दलों के लिए यह बड़ा सवाल है कि वे युवाओं को केवल चुनावी वादे देंगे या रोजगार सृजन के लिए स्पष्ट और मापने योग्य योजनाएं भी सामने रखेंगे।
छोटे व्यापारी और मध्यमवर्ग भी संकट से अछूते नहीं
महंगाई का असर केवल गरीब परिवारों तक सीमित नहीं है। छोटे व्यापारी, दुकानदार, निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी और मध्यमवर्गीय परिवार भी अपनी आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं।बढ़ती लागत, ग्राहकों की सीमित क्रय शक्ति, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और घरेलू खर्च के बीच छोटे कारोबारियों के सामने आर्थिक संतुलन बनाना कठिन हो रहा है।दीपावली जैसे अवसर पर बाजारों में खरीदारी बढ़ने की उम्मीद रहती है, लेकिन यदि आम नागरिक की जेब पर दबाव होगा तो बाजार की रौनक भी प्रभावित होगी।देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए केवल बड़े निवेश और औद्योगिक परियोजनाओं की चर्चा पर्याप्त नहीं है। छोटे व्यापारियों, स्थानीय उद्योगों, स्वरोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी समान महत्व देना होगा।
भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने जनता की कसौटी
भारतीय राजनीति में भाजपा और कांग्रेस दो प्रमुख राजनीतिक दल हैं। दोनों की राजनीतिक भूमिका और जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं।भाजपा केंद्र में सत्तारूढ़ दल होने के नाते सरकार की नीतियों, उपलब्धियों और कमियों के लिए जवाबदेह है। वहीं कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों की जिम्मेदारी है कि वे सरकार की नीतियों की समीक्षा करें, जनहित के मुद्दे उठाएं और जनता के सामने व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत करें।लोकतंत्र की मजबूती के लिए विपक्ष का सक्रिय होना जरूरी है, लेकिन विपक्ष की सार्थकता केवल विरोध प्रदर्शनों से नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों पर लगातार संघर्ष और वैकल्पिक नीतियों से भी तय होती है।इसी तरह सत्ता पक्ष की राजनीतिक मजबूती का आधार केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि जनसमस्याओं का समाधान और शासन की जवाबदेही है।
यदि दोनों दलों की राजनीतिक गतिविधियों में एक-दूसरे पर आरोप लगाने की प्रतिस्पर्धा तो दिखाई दे, लेकिन किसानों की क्षतिपूर्ति, युवाओं के रोजगार, महंगाई पर नियंत्रण और आम आदमी की आर्थिक स्थिति सुधारने के ठोस प्रयास कम दिखाई दें, तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।लोकतंत्र केवल राजनीतिक दलों का नहीं, आम जनता का भी हैलोकतंत्र को बचाने की बात करने वाले राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की असली ताकत आम नागरिक है।जिस किसान की फसल बर्बाद हो गई, जिस युवा को रोजगार नहीं मिल रहा, जिस मजदूर की आमदनी से परिवार का खर्च पूरा नहीं हो रहा और जिस मध्यमवर्गीय परिवार को हर महीने बजट संभालने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, उसकी समस्याओं का समाधान भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता का पैमाना है।लोकतंत्र में चुनाव महत्वपूर्ण हैं, लेकिन चुनाव के बाद जनता को भूल जाना लोकतांत्रिक जवाबदेही की भावना के अनुरूप नहीं है।सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को जनता के बीच जाकर यह बताना चाहिए कि वे महंगाई कम करने, रोजगार बढ़ाने, किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा देने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए क्या ठोस कदम उठाएंगे।
जनता को नारों की नहीं, परिणामों की प्रतीक्षा
आज देश के राजनीतिक माहौल में लोकतंत्र बचाने और लोकतंत्र की रक्षा करने के नारों के बीच आम जनता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि उसकी अपनी समस्याओं पर कब गंभीर चर्चा होगी?लोकतंत्र की रक्षा जरूरी है, लेकिन लोकतंत्र का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है।किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य, आपदा में समय पर मुआवजा, युवा को रोजगार, गरीब को महंगाई से राहत और छोटे व्यापारियों को अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना भी लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती है।भाजपा हो या कांग्रेस, सत्ता हो या विपक्ष, किसी भी राजनीतिक दल को जनता के मूल सवालों से बचने का अवसर नहीं मिलना चाहिए।जनता को यह तय करने का पूरा अधिकार है कि राजनीतिक दलों की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए। क्या राजनीति केवल एक-दूसरे को घेरने और आरोप लगाने तक सीमित रहेगी या फिर जनता की जिंदगी बदलने वाले मुद्दों पर भी गंभीरता से काम होगा?क्योंकि लोकतंत्र केवल सत्ता बचाने या सरकार बदलने का नाम नहीं है। लोकतंत्र उस आम आदमी के सम्मान, अधिकार, रोजगार, आर्थिक सुरक्षा और बेहतर भविष्य का नाम है, जिसके भरोसे पूरी राजनीतिक व्यवस्था खड़ी है।दीपावली के इस पर्व पर देश की जनता को राजनीतिक नारों से अधिक महंगाई से राहत, किसानों को मुआवजा, युवाओं को रोजगार और परिवारों को आर्थिक सुरक्षा की उम्मीद है। अब देखना यह है कि सत्ता और विपक्ष जनता की इन अपेक्षाओं को अपने राजनीतिक एजेंडे में कितनी जगह देते हैं। इस लेख का केंद्रीय प्रश्न है—लोकतंत्र की लड़ाई के बीच आम आदमी की जिंदगी की लड़ाई कौन लड़ेगा?




