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भाजपा सरकार में ही बढ़ी कार्यकर्ताओं की नाराज़गी! संगठन से लेकर सरकार तक उठने लगे सवाल।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएँ काफी बढ़ गई थीं। कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि वर्षों के संघर्ष और संगठनात्मक मेहनत का सकारात्मक परिणाम उन्हें सरकार बनने के बाद मिलेगा। लेकिन अब प्रदेश के कई हिस्सों से यह चर्चा सामने आ रही है कि अनेक कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। संगठनात्मक बैठकों और आपसी चर्चाओं में यह असंतोष खुलकर व्यक्त किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार बनने के बाद भी उनके छोटे-बड़े जनहित के कार्य समय पर नहीं हो पा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं की बातों को अपेक्षित महत्व नहीं दिए जाने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। इससे कार्यकर्ताओं में निराशा का वातावरण बनने की बात कही जा रही है।

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि समय रहते कार्यकर्ताओं की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो इसका असर संगठन की मजबूती और सरकार की जनस्वीकृति पर पड़ सकता है। कुछ कार्यकर्ता यह तक कहते दिखाई दे रहे हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही तो सरकार के प्रति जनता और कार्यकर्ताओं दोनों का विश्वास प्रभावित हो सकता है।

कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि विकास कार्यों की गति अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। सड़क, पेयजल, सिंचाई, शिक्षा और अन्य स्थानीय विकास योजनाओं में तेजी लाने की मांग लगातार उठ रही है। उनका मानना है कि सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक समय पर पहुँचना चाहिए, तभी सरकार की सकारात्मक छवि बनेगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसके जमीनी कार्यकर्ता होते हैं। यदि वही कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगें, तो इसका सीधा प्रभाव संगठन और सरकार दोनों पर पड़ता है। इसलिए सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय तथा कार्यकर्ताओं से नियमित संवाद आवश्यक माना जा रहा है।हालाँकि, सरकार और भाजपा संगठन की ओर से समय-समय पर यह कहा जाता रहा है कि कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान किया जाएगा और जनहित के कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कार्यकर्ताओं की नाराज़गी दूर करने और विकास कार्यों में गति लाने के लिए सरकार और संगठन क्या ठोस कदम उठाते हैं।

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