
नूर मोहम्मद,जिला ब्यूरो चीफ, (सर्वव्यापी)
पर्यावरण संरक्षण और वन विकास के लिए निर्धारित कैम्पा (CAMPA) निधि आखिर किन हाथों में सुरक्षित है? मरवाही वनमंडल में कैम्पा मद से जुड़े कथित 8.14 लाख रुपये के फर्जी भुगतान प्रकरण की विभागीय जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दोषियों पर केवल विभागीय कार्रवाई होगी या फिर सरकारी खजाने से कथित खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज होगा?
जांच प्रतिवेदन में कथित फर्जी प्रमाणकों के आधार पर भुगतान किए जाने, दस्तावेजों की विधिवत जांच किए बिना राशि जारी करने तथा प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट में इसे गंभीर प्रशासनिक चूक के साथ-साथ संदिग्ध वित्तीय अनियमितता माना गया है।शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि भुगतान को वैध दर्शाने के लिए बाद में वनमंडल कार्यालय की आवक शाखा में कथित रूप से फर्जी दस्तावेज दर्ज कराने का प्रयास किया गया। इतना ही नहीं, आरोप है कि शाखा में कार्यरत एक दिव्यांग महिला कर्मचारी पर दबाव बनाकर कूटरचित प्रविष्टियां कराई गईं। यदि विवेचना में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल वित्तीय गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी अभिलेखों से छेड़छाड़, कूटरचना और आपराधिक षड्यंत्र जैसे गंभीर अपराधों का रूप ले सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जांच अधिकारी ने तत्कालीन वनमंडलाधिकारी की भूमिका की अलग से जांच कराने की अनुशंसा भी की है। इससे यह संकेत मिलता है कि जांच अधिकारी ने पूरे घटनाक्रम को केवल अधीनस्थ कर्मचारियों तक सीमित नहीं माना, बल्कि उच्च स्तर पर भी जवाबदेही तय किए जाने की आवश्यकता महसूस की है।*जनता के टैक्स के पैसे पर कथित डाका?
कैम्पा निधि कोई सामान्य मद नहीं है
यह वह राशि है जो पर्यावरण संरक्षण, वन संवर्धन और जनहित के कार्यों के लिए खर्च की जाती है। यदि इसी निधि में कथित फर्जीवाड़ा हुआ है, तो यह केवल सरकारी धन की अनियमितता नहीं बल्कि जनता के टैक्स और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के उद्देश्य पर भी सीधा आघात माना जाएगा। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मामला सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
अब निगाहें राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW), एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और स्थानीय पुलिस पर टिकी हैं। जनता यह जानना चाहती है कि विभागीय जांच रिपोर्ट के बाद क्या एफआईआर दर्ज होगी, क्या निष्पक्ष आपराधिक जांच शुरू होगी, या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगा?



