
विकास नंद/ सर्वव्यापी
खाद की कालाबाजारी और मनमानी कीमत पर बिक्री रोकने के लिए प्रशासन के प्रयासों के बावजूद महासमुंद जिले के सरायपाली विकासखंड में किसानों से यूरिया, डीएपी, फर्टिलाइजर और कीटनाशक जैसी कृषि उपयोगी सामग्री के लिए कथित तौर पर अधिक कीमत वसूले जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। कार्रवाई के बाद भी यदि ओवररेट का खेल जारी है तो कृषि विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
किसानों का आरोप है कि सरायपाली क्षेत्र की कुछ खाद दुकानों में निर्धारित दर के बजाय मनमानी कीमत पर कृषि सामग्री बेची जा रही है। खेती के महत्वपूर्ण सीजन में खाद की जरूरत को देखते हुए किसान मजबूरी में अधिक कीमत चुकाने को विवश हैं। इससे किसानों की उत्पादन लागत बढ़ रही है और उनमें शासन-प्रशासन के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है।
पूर्व कार्रवाई के बाद भी नहीं बदली स्थिति
खाद के वितरण और बिक्री में अनियमितताओं को लेकर पूर्व में कृषि विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ निलंबन जैसी कार्रवाई भी हो चुकी है। इसके बावजूद किसानों से कथित रूप से ओवररेट वसूली की शिकायतें सामने आना विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। सवाल यह है कि जब पहले कार्रवाई की जा चुकी है तो उसके बाद भी खाद दुकानों की नियमित निगरानी और स्टॉक-बिक्री की जांच कितनी प्रभावी ढंग से की जा रही है?
‘खाद से माल बनाने’ के खेल पर कब लगेगा अंकुश?
किसानों के बीच चर्चा है कि खाद की वास्तविक कीमत और दुकानों पर वसूली जा रही कीमत में अंतर की शिकायतों के बावजूद जिम्मेदारों द्वारा प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही है। किसानों का कहना है कि खाद की कालाबाजारी या ओवररेट की शिकायतों पर केवल औपचारिक जांच के बजाय स्टॉक, खरीद-बिक्री रजिस्टर और बिलों की गहन जांच होनी चाहिए।
किसानों को राहत या सिर्फ कार्रवाई का दिखावा?
कृषि विभाग द्वारा समय-समय पर खाद दुकानों की जांच और कार्रवाई किए जाने के बावजूद यदि किसानों को निर्धारित दर पर खाद नहीं मिल रही है, तो इन कार्रवाइयों की प्रभावशीलता पर सवाल उठना लाजिमी है। किसानों की मांग है कि प्रशासन सरायपाली सहित जिलेभर में खाद दुकानों का औचक निरीक्षण कराए और निर्धारित दर से अधिक कीमत वसूलने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे।
किसानों का कहना है कि कार्रवाई के बावजूद ओवररेट का खेल जारी रहना सिर्फ दुकानदारों की मनमानी नहीं, बल्कि निगरानी तंत्र की कमजोरी का भी संकेत है। अब देखना होगा कि कृषि विभाग किसानों की इन शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेता है और खाद की कालाबाजारी एवं ओवररेट पर वास्तविक अंकुश कब लगता है।




