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मूल्याधिष्ठित पत्रकारिता के लिए।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

महात्मा गांधी के कर्तृत्व से पावन हुई वर्धा जिले की इतिहास-यात्रा सही अर्थों में उनके आगमन के साथ ही तेजोमय होती है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की समस्त सूत्र-संचालन की गतिविधियां डेढ़ दशक से भी अधिक समय तक वर्धा-सेवाग्राम की धरती से ही संचालित होती रहीं। इसीलिए वर्धा-सेवाग्राम की यह भूमि स्वतंत्रता आंदोलन की राजधानी भी बन गई थी। परिणामतः ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला देने वाली वर्धा की अनेक क्रांतिकारी घटनाओं से यहां की पत्रकारिता अलग-थलग रह ही नहीं सकती थी।राजेश मडावी ने ‘शताब्दी की साक्ष : वर्धा-सेवाग्राम की पत्रकारिता’ इस ग्रंथ के माध्यम से 1886 से 1986 तक की एक शताब्दी की पत्रकारिता का अध्ययनपूर्ण अवलोकन किया है। वर्धा जिले की अपनी धरती पर रहकर निःस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य निभाने वाले तथा अपने स्वयं के समाचारपत्र, साप्ताहिक, मासिक, त्रैमासिक और अन्य नियतकालिक प्रकाशित करने वाले ध्येयनिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान अब तक अपेक्षाकृत उपेक्षित ही रहा था।वास्तव में 1980 के दशक के प्रारंभ से ही विदर्भ की समाचारपत्र-सृष्टि ने सूचना, तकनीक और मुद्रण-यंत्र के स्तर पर अनेक बुनियादी परिवर्तन स्वीकार किए हैं। अक्षरों के खि़ले जोड़कर या लाइनों की पद्धति से पाठ संयोजन करने की पुरानी व्यवस्था पीछे छूटने लगी। कंप्यूटर युग के आगमन के बाद विदर्भ की समाचारपत्र-सृष्टि में व्यापक परिवर्तन हुए। आगे चलकर वैश्वीकरण और खुली अर्थव्यवस्था के बाद जनसंचार माध्यमों पर पूंजी बाजार आधारित नीतियां हावी होने लगीं।समाचारपत्रों का ‘टार्गेट रीडर’ भी पूरी तरह बदल गया। इसलिए 1886 से 1986 तक की इतनी लंबी यात्रा को लेखन के माध्यम से सामने लाते समय एक निश्चित कालखंड को आधार बनाना आवश्यक ही था। प्रस्तुत ग्रंथ के लेखक राजेश मडावी रूढ़ अर्थों में इतिहासकार नहीं हैं; बल्कि मन की जिज्ञासा, विभिन्न विचारधाराओं के प्रति औत्सुक्य और पत्रकारिता के प्रति गंभीर आस्था से उन्होंने लेखन की यह एकल जिम्मेदारी स्वीकार की। साक्षेपी दृष्टिकोण से उसे पूर्णता तक पहुंचाया, यह अधिक महत्वपूर्ण है।कुछ विषयों को विशिष्ट कालखंडों में विशेष महत्व प्राप्त होता है। वर्धा से संचालित स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियां और उस समय की यहां की पत्रकारिता इसका एक उज्ज्वल उदाहरण हैं। एक ओर स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो रही थीं, वहीं दूसरी ओर वर्धा की तत्कालीन पत्रकारिता का सुसंगत इतिहास प्रस्तुत करने वाले ग्रंथों का अभाव सभी को खटक रहा था।इस पृष्ठभूमि में रामचंद्र गोविंद कानडे का ‘मराठी नियतकालिकांचा इतिहास’ (1832-1937) और ‘मराठी वृत्तपत्रांचा इतिहास’ (1984) जैसे बृहद् ग्रंथ लिखने वाले इतिहासकार रा. के. लेले का योगदान प्रेरणादायी और पथप्रदर्शक है। हालांकि उस समय भी जिला स्तर से अनेक समाचारपत्र और नियतकालिक प्रकाशित होते थे। ऐसे अनेक नियतकालिकों का उल्लेख लेले के ग्रंथ में नहीं मिलता। इसलिए राजेश मडावी द्वारा जिला स्तर पर पूरा किया गया यह लेखन-प्रकल्प विदर्भ की समाचारपत्र-सृष्टि और समग्र रूप से मराठी पत्रकारिता के ऐतिहासिक लेखन की सीमाओं को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।संदर्भों के साथ इस प्रकार का लेखन-प्रकल्प पूरा करने के लिए तीव्र सामाजिक चेतना रखने वाले पत्रकारों, विचारकों और बुद्धिजीवी अध्येताओं की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है; फिर भी मडावी ने अपनी सीमाओं के बावजूद इस अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य को धैर्य और दृढ़ता के साथ पूर्ण किया, इसका मुझे हृदय से आनंद है।स्वतंत्रता-पूर्व काल में महाराष्ट्र की सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी पत्रकारिता को प्रोत्साहन और आर्थिक सहयोग देने वाले दानशूर लोग वर्धा शहर से भी आगे आए थे। उनमें अग्रणी थे गांधीजी को वर्धा लाने वाले देशभक्त उद्योगपति जमनालाल बजाज। नागपुर से 1907 में प्रकाशित तिलक-प्रेरित ‘हिंदी केसरी’ को बजाज ने उस समय 100 रुपये की उल्लेखनीय आर्थिक सहायता दी थी।रोहणी के सत्यशोधक आंदोलन के कर्मठ कार्यकर्ता तुकारामजी वसू ने अपनी पत्नी की स्मृति में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के ‘बहिष्कृत भारत’ पाक्षिक को 1929 में पांच रुपये की सहायता देकर श्रद्धांजलि अर्पित की थी। इसके अलावा, जीवनपर्यंत वसू ने अनेक सत्यशोधक नियतकालिकों को समय-समय पर आर्थिक सहयोग देकर आंदोलन में योगदान दिया, इसका इतिहास भी मिलता है। ‘मूकनायक’ और ‘जनता’ पाक्षिकों के सदस्य बनने के लिए वर्धा में उस समय विभिन्न कार्यक्रमों में प्रस्ताव पारित किए गए थे, यह जानकारी मडावी के ग्रंथ से पहली बार सामने आती है।ये घटनाएं वर्धा जिले की मूल्यनिष्ठ और विवेकशील परंपरा की ऐसी झलक प्रस्तुत करती हैं, जो समग्र रूप से मराठी पत्रकारिता के लिए पोषक और प्रेरणादायी रही है।वर्धा कहा जाए तो ‘गांधी-विनोबा का जिला’ यह पहचान तुरंत आंखों के सामने उभरती है। लेकिन इस नाम का आकर्षण कैसे निर्मित हुआ, वर्धा का प्राचीन इतिहास और भूगोल क्या है, इन सबकी समग्र जानकारी के संदर्भ में आज भी एक प्रकार की अनभिज्ञता दिखाई देती है। इतिहासकारों ने इस विषय पर मूलगामी लेखन किया हो, ऐसा बहुत अधिक दिखाई नहीं देता। वैदर्भीय इतिहास लेखन के परिप्रेक्ष्य में वर्धा का उल्लेख भी अन्य जिलों की तरह ही सामान्य रूप से होता रहा है और उसी को वर्धा का इतिहास मान लिया जाता है।इसलिए इस जिले के संबंध में समग्र लेखन का अभाव आज भी मन में खटकता है। ऐसा भी नहीं कि इस दिशा में कोई प्रयास नहीं हुआ; लेकिन वे प्रयास सीमित रहे। वर्धा के सुपुत्र और शैलीकार लेखक मधुकर केचे, कथाकार वामनराव चोरघडे, न्यायमूर्ति चंद्रशेखर धर्माधिकारी आदि वर्धेकरों ने प्रसंगानुसार जो लेखन किया, वह आज भी पाठकों के लिए लोकप्रिय और प्रेरणादायी है। केचे का ‘वर्धा परिसर’ यह ललित और रमणीय ग्रंथ अत्यंत विशिष्ट है और पाठकों को मोह लेने वाला है। हालांकि यह ग्रंथ रिपोर्ताज के स्वरूप का है।पिछले तीन दशकों में मैंने वर्धा के इतिहास से पाठकों का परिचय साप्ताहिक ‘स्वराज्य’, ‘असे अमुचे गाव’, मासिक ‘किर्लोस्कर’, ‘महाराष्ट्र टाइम्स’, ‘नवशक्ति’ आदि दैनिकों और नियतकालिकों के माध्यम से समय-समय पर कराया है। वर्धा जिले के सांस्कृतिक इतिहास-लेखन की एक परियोजना भी मैंने हाथ में ली थी। फिलहाल वह भी पूर्णता की ओर अग्रसर है।2017 में ‘वर्धा शतकोत्तर सुवर्ण महोत्सवी’ वर्ष के अवसर पर वर्धा श्रमिक पत्रकार संघ ने वर्धा जिले का समग्र अवलोकन प्रस्तुत करने वाला एक ग्रंथ प्रकाशित करने की योजना बनाई थी। उस ग्रंथ के संपादन की जिम्मेदारी मेरे पास थी। इसी दौरान राजेश मडावी दैनिक ‘सकाळ’ में वर्धा जिले से संबंधित ‘दुर्लक्षित नोंदी’ नामक लोकप्रिय स्तंभ लिख रहे थे। श्रमिक पत्रकार संघ द्वारा प्रस्तावित ग्रंथ के लिए वर्धा की समाचारपत्र-सृष्टि पर एक लेख लिखने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई।वर्धा शहर के प्रति उनका निर्मल प्रेम और जिज्ञासा केवल उस एक लेख तक सीमित नहीं रही। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ-सामग्री की खोज की। उस समय के समाचारपत्रों और नियतकालिकों को संग्रहित किया। दुर्लभ दस्तावेजों से नीर-क्षीर विवेक के साथ आवश्यक टिप्पणियां और तथ्य संकलित किए। अनेक लोगों के साक्षात्कार लिए। सामाजिक आंदोलनों तथा माध्यमों से जुड़े वरिष्ठ लोगों से चर्चा की। लेखन के लिए गुणवत्तापूर्ण संदर्भ-साधनों का आधार लेकर उन्होंने यह ग्रंथ तैयार किया है।वर्धा की पत्रकारिता के गांधी-पूर्व काल को टिळक पत्रकारिता, सत्यशोधक पत्रकारिता, आंबेडकरी पत्रकारिता और गांधी युग की पत्रकारिता जैसे विभिन्न कालखंडों में विभाजित किया जा सकता है। वर्धा जिले में वस्तुनिष्ठ समाचारों के साथ-साथ उनके पीछे प्रवाहित राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक धाराओं, शक्तियों तथा घटनाओं के संभावित परिणामों का विश्लेषण करते हुए पाठकों को मर्मदृष्टि प्रदान करने वाली जनहितैषी पत्रकारिता की परंपरा विकसित हुई, इसका इतिहास मिलता है। इसे अन्वयार्थक पत्रकारिता (Interpretative Journalism) भी कहा जा सकता है।सही अर्थों में गांधी-विचार आधारित पत्रकारिता का उद्गम और ऊर्जा-केंद्र सेवाग्राम-वर्धा की यही भूमि है। गांधी-विचार और मराठी पत्रकारिता का पहला स्वर वर्धा जिले में ही सुनाई दिया। हम आचार्य विनोबा भावे को सर्वोदय और भूदान आंदोलन के अध्वर्यु के रूप में जानते हैं। लेकिन विनोबा ने सर्वोदय विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए 1923 में ‘महाराष्ट्र धर्म’ नामक मासिक शुरू किया था। इस दृष्टि से यह पत्रकारिता गांधी युग के आरंभ का संकेत देती है।इस कालखंड की पत्रकारिता का स्वरूप ‘प्रोफेशन’ नहीं, बल्कि ‘मिशन’ था। गांधी-विचारों के रचनात्मक और क्रियाशील प्रयोग इस पत्रकारिता की आधारभूमि थे। किसी समस्या अथवा सत्य के जिस पक्ष को हम सही मानते हैं, उसका समर्थन करने के लिए निर्भीकता से तर्क प्रस्तुत करना—अर्थात Advocacy Journalism—भी वर्धा में प्रभावी रूप से मौजूद था।इसीलिए यह ग्रंथ केवल एक जिले की पत्रकारिता का इतिहास नहीं है; बल्कि एक मूल्यनिष्ठ और कृतीनिष्ठ पत्रकारिता की आधारभूमि का इतिहास भी है। इस अर्थ में यह ग्रंथ अत्यंत मौलिक बन जाता है। मडावी के ग्रंथ में दिए गए अनेक उदाहरण इसे स्पष्ट करते हैं।वर्धा का पहला साप्ताहिक समाचारपत्र नारायणराव थोरात ने 1886 में ‘वर्धा लहरी’ नाम से शुरू किया था। इसी कालखंड में नागपुर के लक्ष्मण कामाठी ने राजे भोसले की पहल से ‘फनिंद्रपूर मनिप्रकाश’ नामक नियतकालिक शुरू किया था। अर्थात वर्धा और नागपुर के पहले समाचारपत्र लगभग एक ही समय में प्रकाशित हुए दिखाई देते हैं। इसके संबंध में लेखक ने ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ जानकारी प्रस्तुत की है।कानून विषयक मासिक शुरू करने का श्रेय भी वर्धा शहर को प्राप्त है। यह सम्मान 1886 में शुरू किए गए केशवराव जोरवेकर के ‘न्यायदर्पण’ को दिया जाता है। हरदास सदाशिव पटवर्धन ने 1890 में ‘न्यायसुधा’ मासिक शुरू किया। इससे स्पष्ट होता है कि वर्धा की पत्रकारिता की शुरुआत ही कानून-विषयक और वैचारिक नियतकालिकों से हुई थी।सत्यशोधक पंढरीनाथ सीताराम पाटील द्वारा लिखित महात्मा ज्योतिबा फुले का चरित्र 1928 में वर्धा से प्रकाशित हुआ। चरित्रग्रंथ प्रकाशित करने वाले जैन समाजभूषण जिनदास चवडे भी एक अग्रणी पत्रकार थे। उन्होंने 1897 में ‘जैन भास्कर’ नामक हिंदी पत्रिका तथा 1908 में ‘जैन बंधू’ नामक मराठी समाचारपत्र शुरू किया। जिनदास चवडे ने ही वर्धा में मुद्रण व्यवसाय की नींव रखी, ऐसा मडावी का दावा है। वर्धा के समाचारपत्रों के इतिहास को दर्ज करते समय लेखक ने अनेक चौंकाने वाली और उपेक्षित घटनाओं पर प्रकाश डाला है। दैनिक ‘तरुण भारत’ और वर्धा के बीच का ऐतिहासिक संबंध इसका एक उदाहरण है।स्वतंत्रता आंदोलन के लिए भारतीय जनता को ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रेरित करने तथा गांधी-विचारों पर आधारित क्रांतिकारी और रचनात्मक उपक्रमों का प्रचार-प्रसार करने वाले नियतकालिकों की समृद्ध परंपरा वर्धा को प्राप्त हुई। प्रस्तुत ग्रंथ में इन नियतकालिकों का स्वरूप, उनकी विशेषताएं तथा संपादकों के जीवनकार्य का मडावी ने तटस्थ परिचय प्रस्तुत किया है।प्रस्तुत ग्रंथ ने वर्धा जिले की समाचारपत्र-सृष्टि के साथ-साथ सत्यशोधक आंदोलन के अंतरंग को भी उजागर किया है। प्राचीन जैन साहित्य के ग्रंथों का प्रकाशन, उनका मूलगामी विवेचन तथा महात्मा फुले के पहले चरित्रग्रंथ का प्रकाशन वर्धा से होने संबंधी जानकारी प्रेरणादायी है।विशेष बात यह है कि व्यक्ति और संस्थाओं के प्रति भक्तिभाव स्वीकार किए बिना, आज के माध्यमों का नीतिशास्त्र लोककल्याण से दूर नहीं जाना चाहिए, इस विवेकशील दृष्टि से उन्होंने यह ग्रंथ लिखा है। इसलिए लेखन में वस्तुनिष्ठता, स्पष्टवादिता और नीर-क्षीर विवेक का अनुभव होता है।इतिहास-लेखन कभी भी पूर्ण नहीं होता। यह एक निरंतर चलने वाली ज्ञान-प्रक्रिया है। नए प्रमाण सामने आते हैं तो पुराना इतिहास बदलता है। कोई लेखक यदि कुछ उपेक्षित तथ्यों को सामने लाता है तो मतभेदों का दौर भी शुरू हो सकता है। ज्ञान के क्षेत्र में संवाद की यह सत्यान्वेषी दृष्टि लेकर ही लेखक और शोधकर्ता लेखन करते हैं।संजय सोनवणी द्वारा किया गया फुले-आंबेडकरी विमर्श तथा कर्मवीर विठ्ठल रामजी शिंदे द्वारा किया गया सत्यान्वेषी समाज-चिंतन इसका उदाहरण है। डॉ. आंबेडकर ने ‘जनता’ साप्ताहिक के माध्यम से खानदेश के भिल्ल आदिवासियों की स्थिति पर अत्यंत महत्वपूर्ण लेखन किया था। लेकिन यह विषय लंबे समय तक उपेक्षित ही रहा। डॉ. सुनीता सावरकर ने डॉ. आंबेडकर के आदिवासी समुदाय के संबंध में किए गए कार्य को ‘खानदेशातील भिल्ल आदिवासी व आंबेडकरी चळवळ’ इस ग्रंथ के माध्यम से चर्चा के केंद्र में लाया।शोषित और अधीन समुदायों के सांस्कृतिक संघर्ष का विश्लेषण करने वाली सत्यान्वेषी मूल्यदृष्टि राजेश मडावी में भी है, इसकी झलक उनके अन्य वैचारिक स्फुट लेखन से सजग पाठकों को पहले ही दिखाई दे चुकी है।1886 से 1986 तक की एक शताब्दी के दौरान वर्धा से प्रकाशित हुए समाचारपत्रों का अवलोकन कर उन्होंने यह सूत्रबद्ध इतिहास पाठकों के सामने रखा है। विशेष बात यह है कि ग्रंथ के परिशिष्ट में नौ संपादकों के गद्य-निबंध भी शामिल किए गए हैं। ‘पत्रकारिता : कल, आज और कल’ इस विषय पर ज्येष्ठ संपादक सुरेश द्वादशीवार का साक्षात्कार लिया गया है। इससे वर्तमान पत्रकारिता पर भी भेदक प्रकाश पड़ता है। इससे संपादकों के वैचारिक लेखन का स्वरूप और तत्कालीन परिस्थितियों की जानकारी मिलती है।उपसंहार में लेखक ने कुछ महत्वपूर्ण निरीक्षण दर्ज किए हैं। उनमें निहित अन्वयार्थ भी बहुत महत्वपूर्ण है। किसी एक समाचारपत्र का सर्वांगीण आकलन करके निष्कर्ष प्रस्तुत करना इस ग्रंथ का उद्देश्य नहीं है। इसलिए पाठकों को जानकारी उपलब्ध कराने पर ही लेखक का अधिक जोर दिखाई देता है। इसमें विश्लेषणात्मक विवेचन का अभाव दिखाई देता है—यही इस ग्रंथ की एक सीमा है।फिर भी वर्धा-सेवाग्राम की समाचारपत्र-सृष्टि पर पर्याप्त ग्रंथ-संपदा उपलब्ध न होने के बावजूद मडावी ने इस विषय पर लिखने का साहस दिखाया। ऐतिहासिक संदर्भ-मूल्य से संपन्न ‘शताब्दी की साक्ष : वर्धा-सेवाग्राम की पत्रकारिता’ ने वैचारिक समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जीवनाभिमुखता का आग्रह रखने वाली वर्धा की पुरानी पीढ़ी के ध्येयनिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का सटीक परिचय इस ग्रंथ ने कराया है।यह परिचय वर्तमान पत्रकारिता की टूटती जा रही लोकजीवन के प्रति प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित करने की दिशा में प्रेरणादायी सिद्ध होगा। आज के पूंजीवादी और मालिक-समर्थक वर्चस्व के बीच पत्रकारों और संपादकों के हिस्से में आए सीमित अवकाश में भी जनता की आवाज को बुलंद करने के लिए यह ग्रंथ सदैव शक्ति देता रहेगा, ऐसा विश्वास है।राजेश मडावी के हाथों भविष्य में और अधिक शोधपरक तथा सृजनात्मक लेखन हो, इसी अपेक्षा के साथ उन्हें मेरी हार्दिक शुभकामनाएं। इसका समीक्षात्मक करने वाले डॉ. राजेंद्र मुंढेज्येष्ठ पत्रकार, समीक्षकसाहित्य, कला एवं सांस्कृतिक इतिहास शोधकर्तावर्धा.442002 दूरभाष : 9422140049 है।

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