
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

भारत रत्न, पद्म भूषण और पद्म श्री जैसे राष्ट्रीय नागरिक सम्मानों को नाम के आगे-पीछे उपाधि की तरह इस्तेमाल किए जाने के आरोपों ने अब छत्तीसगढ़ शासन के प्रशासनिक गलियारों तक दस्तक दे दी है। बिलासपुर निवासी राकेश चौबे द्वारा इस संबंध में की गई शिकायत पर मुख्य सचिव कार्यालय ने कार्रवाई करते हुए मामला नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग को भेज दिया है। इसी बीच सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी भी सामान्य प्रशासन विभाग ने नगरीय प्रशासन विभाग को हस्तांतरित कर दी है। अब सवाल केवल लगाए गए बोर्डों का नहीं, बल्कि यह भी उठ रहा है कि आखिर इन बोर्डों को लगाने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया, सरकारी धन से इन पर कितना खर्च हुआ और शिकायत सामने आने के बाद जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या कदम उठाए।पूरे मामले की शुरुआत 18 जून तथा 24 जून 2026 को मुख्य सचिव, छत्तीसगढ़ शासन को भेजे गए शिकायत पत्र से हुई। शिकायतकर्ता राकेश चौबे ने अपने ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 18(1) तथा भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के 1996 के Balaji Raghavan v. Union of India फैसले का हवाला देते हुए नागरिक सम्मानों को उपाधि के रूप में इस्तेमाल किए जाने पर सवाल उठाया था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि बिलासपुर नगर पालिक निगम के सार्वजनिक स्थानों, चौक-चौराहों अथवा अन्य स्थानों पर लगाए गए कुछ बोर्डों और शिलालेखों में नागरिक सम्मानों को संबंधित व्यक्तियों के नाम के साथ इस तरह प्रदर्शित किया गया है, जिससे वे उपाधि के रूप में प्रयुक्त होते दिखाई देते हैं।शिकायतकर्ता ने इन बोर्डों को हटाने के लिए नगर निगम आयुक्त को निर्देशित करने तथा भविष्य में शासकीय और अर्द्धशासकीय संस्थाओं द्वारा भारत रत्न एवं पद्म सम्मानों के उल्लेख को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की थी। शिकायत के साथ संबंधित बोर्डों के छायाचित्र और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के प्रासंगिक अंश भी संलग्न किए गए थे। बताया गया है कि यह शिकायत स्पीड पोस्ट के माध्यम से मुख्य सचिव कार्यालय भेजी गई थी।मामले में महत्वपूर्ण मोड़ 17 सितंबर 2026 को आया। मुख्य सचिव कार्यालय के अवर सचिव ओम प्रकाश पात्रे द्वारा जारी पत्र क्रमांक GEND/58445/2026-0/0 Chief Secretary में शिकायतकर्ता के पत्र को आवश्यक कार्रवाई के लिए सचिव, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग को भेजे जाने का उल्लेख है। कार्यालयीन रिकॉर्ड के अनुसार यह पत्र मुख्य सचिव कार्यालय के जावक डाक क्रमांक 1121481/सीएस/2026 दिनांक 18 जून 2026 से संबंधित बताया गया है।यानी जिस शिकायत में सार्वजनिक स्थलों पर लगाए गए कथित विवादित बोर्डों को हटाने और उनकी वैधानिकता स्पष्ट करने की मांग की गई थी, वह अब सीधे उस विभाग की मेज पर पहुंच चुकी है जिसके अधीन नगरीय निकायों से जुड़े प्रशासनिक विषय आते हैं। अब निगाहें नगरीय प्रशासन विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।इसी बीच शिकायतकर्ता ने मामले की प्रगति और संबंधित कार्रवाई की जानकारी हासिल करने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का सहारा लिया। 12 सितंबर 2026 को प्रस्तुत आरटीआई आवेदन पर सामान्य प्रशासन विभाग के सूचना का अधिकार प्रकोष्ठ ने 18 सितंबर 2026 को जवाबी कार्रवाई की। जन सूचना अधिकारी एवं अनुभाग अधिकारी आनंद शुक्ला द्वारा जारी पत्र क्रमांक RTI/2819/2026-GAD-13 में कहा गया कि मांगी गई जानकारी का निकटतम संबंध नगरीय प्रशासन विभाग से होने के कारण आवेदन को आरटीआई अधिनियम की धारा 6(3)(क) के तहत संबंधित दस्तावेजों और 10 रुपये के भारतीय पोस्टल ऑर्डर सहित नगरीय प्रशासन विभाग को हस्तांतरित किया जा रहा है।आरटीआई आवेदन का इस तरह विभागांतरण इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। अब नगरीय प्रशासन विभाग के सामने केवल शिकायत पर कार्रवाई का सवाल नहीं है, बल्कि आरटीआई के जरिए मांगी गई सूचनाओं का जवाब देने की जिम्मेदारी भी आ गई है। इससे यह पता चल सकेगा कि संबंधित बोर्डों को लगाने का प्रस्ताव किसने बनाया, अनुमति किस स्तर से मिली, निर्माण अथवा स्थापना पर कितना व्यय हुआ और शिकायत सामने आने के बाद उसे हटाने या सुधारने के लिए क्या कदम उठाए गए।मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि संबंधित नागरिक सम्मानों को बोर्डों पर नाम के साथ इस रूप में प्रदर्शित किया गया है कि वे उपाधि जैसे प्रतीत होते हैं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? क्या बोर्ड लगाने से पहले किसी अधिकारी या विभाग ने इसकी वैधानिकता की जांच की थी? यदि जांच हुई थी तो उसका रिकॉर्ड कहां है? और यदि जांच नहीं हुई थी तो सार्वजनिक धन से तैयार ऐसे बोर्डों के संबंध में जवाबदेही किसकी तय होगी? चौबे का कहना है कि संविधान सर्वोपरि है और नागरिक सम्मानों के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। उनका कहना है कि मुख्य सचिव कार्यालय द्वारा शिकायत को नगरीय प्रशासन विभाग को भेजना मामले में प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की शुरुआत है। उन्होंने संकेत दिया है कि नगरीय प्रशासन विभाग से आरटीआई के माध्यम से बिलासपुर नगर निगम के संबंधित अधिकारियों, बोर्डों की स्थापना, खर्च और अब तक की कार्रवाई से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी जाएगी।इस पूरे घटनाक्रम में अब अगली निगाह नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग पर है। शिकायत, मुख्य सचिव कार्यालय की कार्रवाई और आरटीआई आवेदन के हस्तांतरण के बाद यह मामला महज एक शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है। यदि विभाग जांच करता है तो बोर्डों की वैधानिकता के साथ-साथ उन्हें स्थापित करने की प्रशासनिक प्रक्रिया और वित्तीय जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में आ सकती है।श्री चैबे ने कहा है कि यदि शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं होती है तो वे उपलब्ध कानूनी विकल्पों का सहारा लेते हुए उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर करने पर विचार करेंगे। हालांकि फिलहाल निर्णायक कार्रवाई नगरीय प्रशासन विभाग की ओर से होना बाकी है। ऐसे में अब असली परीक्षा इस बात की है कि शासन की फाइल केवल एक विभाग से दूसरे विभाग तक पहुंचती है या वास्तव में संबंधित बोर्डों, उनके निर्माण की प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर ठोस कार्रवाई भी होती है।



