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संपादक की कलम से…*पोला तिहार : गोधन के मान, किसान के सम्मान अउ माटी के पहिचान।

तरुण कौशिक, संपादक

छत्तीसगढ़ के माटी मं तीज-तिहार मन सिरिफ उत्सव नइ आयं, ये हमर पुरखा मन के सोच, हमर लोकजीवन के संस्कार अउ प्रकृति संग हमर गहिर नाता के पहचान आय। हमर परंपरा मं प्रकृति ला देवता के रूप मं मान देय गे हवय। अन्न, जल, माटी, पेड़-पौधा अउ पशुधन—सबो ला जीवन के आधार माने गे हवय। एही लोकभावना के सुंदर रूप आय पोला तिहार।भादो महीना के कृष्ण पक्ष अमावस्या के दिन मनाय जाने वाला पोला तिहार खास करके खेती-किसानी अउ गोधन संग जुड़े हवय। छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश अउ कर्नाटक मं घलो ए तिहार ला अलग-अलग लोकपरंपरा के संग मनाय जाथे।छत्तीसगढ़िया किसान के जीवन मं बैल के महत्त्व ला शब्द मं पूरा बताय कठिन हवय। खेत के माटी ला जोतइया, किसान के मेहनत मं संग देइया अउ अन्न उपजाय के काम मं सहारा बनइया बैल ला पोला के दिन देवतुल्य मानके पूजा जाथे।पोला के पहिली बैल मन ला नहवाय जाथे। तेल-हल्दी लगाय जाथे, सींग मन ला रंगाय जाथे अउ कौड़ी, घुंघरू ले सजाय जाथे। कांधा मं मक्खन के लेप लगाके आरती उतारे जाथे। भोग चढ़ाके किसान अपन खेती के ए संगी बर कृतज्ञता प्रकट करथे।बैल सिरिफ पशु नइ,किसान के सुख-दुख के संगी आय।छत्तीसगढ़ मं पोला तिहार ला लेके एक गहिर लोकमान्यता हवय कि ए दिन अन्न माता गर्भ धारण करथें। पोला के पहिली रात बैगा अउ गांव के मुखिया मन गांव के सीमा के बाहिर जाके गर्भ पूजा करथें।लोकविश्वास हवय कि एही बेरा धान के बालियें मं दूध भरना शुरू होथे। किसान बर ये नवा फसल के आवइया समृद्धि के संकेत आय।ए मान्यता मं हमर पुरखा मन के प्रकृति ज्ञान अउ खेती-किसानी के अनुभव के झलक साफ देखे बर मिलथे।पोला तिहार संग भगवान श्रीकृष्ण अउ पोलासुर के कथा घलो लोकजीवन मं प्रचलित हवय। जनश्रुति के अनुसार कंस ह कृष्ण ला मारवाय बर पोलासुर राक्षस ला गोकुल भेजिस। भगवान कृष्ण ह पोलासुर के वध कर दिन। ए घटना के स्मृति मं पोला तिहार मनाय के परंपरा शुरू होइस, अइसन लोकमान्यता हवय।पोला तिहार के रौनक गांव के गली, आंगन अउ चउक-चौराहा मं देखे बर मिलथे। घर-घर मं ठेठरी, खुरमी अउ दूसर पकवान बनथे। बैल मन ला भोग लगाय जाथे।लइका मन के खुशी त अलगच रहिथे। माटी के नंदिया बैल, चूल्हा, कड़ाही, करछुल, चक्की अउ दूसर खिलौना बाजार ले घर तक पहुंचथें। लइकी मन खेल-खेल मं घर-गृहस्थी के सीख लेथें अउ लइका मन माटी के बैल के पूजा करके ओकर दौड़ लगाथें।पोला के संझा गांव के मैदान या चउक मं लइकी मन जुरथें। नंदी बैल या साहड़ा देव के प्रतिमा के लगे अपन घर ले लाय माटी के खिलौना ला पोरा के रूप मं पटकथें।ओकर बाद पकवान खाय, हंसी-मजाक अउ खेल-कूद के दौर चलथे। कबड्डी, खो-खो, सुरपाटी जइसन पारंपरिक खेल गांव के माहौल ला उमंग ले भर देथें।आज के मोबाइल अउ इंटरनेट के समय मं अइसन लोकखेल मन के महत्त्व अउ बढ़ गे हवय। ये मन लइका मन ला अपन संस्कृति अउ समाज संग जोड़े रखथें।परंपरा बचे रहिही, त संस्कृति बचे रहिहीसमय बदलत हवय। खेती मं मशीन मन के उपयोग बढ़ गे हवय, गांव के जीवनशैली बदलत हवय, फेर पोला तिहार आज घलो हमर सांस्कृतिक चेतना ला जिंदा रखे के काम करथे।ये तिहार हमन ला सिखाथे कि प्रकृति के सम्मान, पशुधन के संरक्षण अउ किसान के मेहनत के कदर हमर जीवन के जरूरी हिस्सा आय।पोला मं बैल के पूजा होथे, फेर असल मं सम्मान किसान के मेहनत के होथे। अन्न के पूजा होथे, फेर ओकर भीतर प्रकृति बर आभार छिपे रहिथे। माटी के खिलौना फूटथे, फेर ओकर संग हमर लोकजीवन के रंग अउ अपनपन अउ गहिर हो जाथे।आवव, पोला तिहार मं सिरिफ परंपरा ला नइ,बल्कि अपन माटी, अपन गोधन, अपन किसान अउ अपन संस्कृति ला घलो सम्मान देवव।गोधन के मान, किसान के सम्मान—पोला हमर पहिचान।बैल हमर खेती के संगी, अन्न हमर जीवन के आधार। माटी ला सहेजव, गोधन ला बचावव, संस्कृति ला आगू बढ़ावव। जिहां गोधन के मान, उहां किसान के सम्मान। माटी, गोधन अउ अन्न—तीनों ले बने हमर छत्तीसगढ़ के जीवन।

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