तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के वन विभाग में इन दिनों एक युवा आईएफएस अधिकारी के कथित कार्यशैली और व्यवहार को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। विभागीय गलियारों में इस अधिकारी को लेकर तरह-तरह की बातें सामने आ रही हैं। चर्चा है कि अफसर का रुतबा कुछ ऐसा है कि फोन पर बात करना तो दूर, मोबाइल पर भेजे गए संदेशों का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझते। सवाल यह है कि आखिर संवैधानिक व्यवस्था और प्रशासनिक मर्यादाओं के तहत काम करने वाले एक युवा अधिकारी के भीतर इतना अहंकार क्यों दिखाई दे रहा है?वन मुख्यालय से जुड़े कुछ लोगों के बीच इस अधिकारी के व्यवहार को लेकर असंतोष की चर्चाएं हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि अधिकारी तक अपनी बात पहुंचाना भी आसान नहीं है। यदि कोई अधीनस्थ अधिकारी, कर्मचारी अथवा आम नागरिक, पत्रकार किसी जरूरी विषय पर संपर्क करने का प्रयास करता है, तो उसे जवाब मिलने की उम्मीद कम ही रहती है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आईएफएस जैसी प्रतिष्ठित सेवा में पदस्थ अधिकारी जनता और अपने अधीनस्थों के प्रति जवाबदेही से मुक्त हो जाते हैं? आखिर वन विभाग का काम केवल फाइलों पर आदेश जारी करना नहीं, बल्कि जंगल, वन्यजीव और वनांचल में रहने वाले लोगों की समस्याओं का समाधान करना भी है।मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार में प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और जनसेवा की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यशैली पर उठ रहे सवालों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।आखिर कौन हैं वे आईएफएस अधिकारी, जिनके व्यवहार को लेकर वन मुख्यालय में इतनी चर्चाएं हैं? क्या वन विभाग के आला अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करेंगे? या फिर पद और प्रतिष्ठा के सामने जवाबदेही के सवाल यूं ही दबे रहेंगे?यह सवाल किसी एक अधिकारी के सम्मान का नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की गरिमा और जनता के प्रति जवाबदेही का है। अधिकारी कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह जनता की सेवा के लिए ही पदस्थ होता है, न कि जनता और अपने सहयोगियों को अपने पद का अहसास कराने के लिए।




