
विकास नंद/ सर्वव्यापी
नेशनल हाईवे-353 पर सरायपाली और बसना के बीच स्थित छुईपाली टोल प्लाजा अब स्थानीय लोगों के लिए सिर्फ टोल वसूली का केंद्र नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की सक्रियता और जवाबदेही से जुड़ा सवाल बनता जा रहा है। सरायपाली से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित टोल प्लाजा के कारण रोजमर्रा के काम से इस मार्ग पर आने-जाने वाले स्थानीय वाहन चालकों में नाराजगी देखी जा रही है। लोगों का सीधा सवाल है कि जब सरायपाली और बसना के बीच की दूरी करीब 18 किलोमीटर है, तो इतने छोटे अंतराल में टोल की व्यवस्था से स्थानीय लोगों को कब राहत मिलेगी?
ओडिशा सीमा से सटा सरायपाली छत्तीसगढ़ का अंतिम विधानसभा क्षेत्र है। यहां से प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग रोजगार, कारोबार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी कार्यों और अन्य जरूरी कामों से बसना, महासमुंद तथा आसपास के क्षेत्रों में आवागमन करते हैं। ऐसे में कम दूरी के इस मार्ग पर स्थित टोल प्लाजा नियमित यात्रियों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ और असुविधा का कारण बन रहा है।
‘खास लोगों को छूट तो आम जनता से क्यों वसूली?
’स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि राजनीतिक दलों से जुड़े कुछ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को टोल में विशेष सुविधा या छूट मिलती है। हालांकि इस संबंध में किसी अधिकृत नियम या दस्तावेज की सार्वजनिक पुष्टि होना बाकी है। ऐसे में स्थानीय लोगों की मांग है कि टोल प्रबंधन और संबंधित विभाग स्पष्ट करें कि किन श्रेणियों के लोगों और वाहनों को किस नियम के तहत छूट या रियायत दी जाती है।यही सवाल अब राजनीतिक गलियारों तक भी पहुंच रहा है—यदि किसी वर्ग को नियमों के तहत विशेष सुविधा मिल सकती है, तो रोजाना आवागमन करने वाले आम स्थानीय वाहन चालकों के लिए राहत का
रास्ता क्यों नहीं निकाला जा सकता?
गौरतलब है कि सरायपाली विधायक और महासमुंद लोकसभा क्षेत्र के सांसद का क्षेत्र से निकट राजनीतिक एवं भौगोलिक जुड़ाव है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे में छुईपाली टोल से जुड़ी समस्या को प्रदेश और केंद्र स्तर पर उठाकर समाधान की पहल की उम्मीद स्वाभाविक है।‘
ट्रिपल इंजन’ सरकार में भी स्थानीय समस्या जस की तस
प्रदेश और केंद्र में एक ही दल की सरकार तथा स्थानीय स्तर पर मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व होने के बावजूद छुईपाली टोल से जुड़ी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाने को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं।स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सरायपाली विधानसभा क्षेत्र ने लोकसभा चुनावों में भाजपा के पक्ष में महत्वपूर्ण समर्थन दिया है। इसके बावजूद आम लोगों की रोजमर्रा की परेशानी से जुड़े इस मुद्दे पर अपेक्षित पहल दिखाई नहीं देने से निराशा बढ़ रही है।
लोगों का कहना है कि विकास सिर्फ बड़ी सड़कों, भवनों और घोषणाओं का नाम नहीं है। आम आदमी को प्रतिदिन जिन समस्याओं से जूझना पड़ता है, उनका समाधान भी विकास की कसौटी होना चाहिए।
दिल्ली तक मजबूत पकड़, फिर सरायपाली की आवाज क्यों नहीं पहुंच रही?
स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की प्रदेश से लेकर केंद्र तक राजनीतिक पहुंच है। यदि बड़े मुद्दों के लिए सरकार के शीर्ष स्तर तक बात पहुंचाई जा सकती है, तो फिर सरायपाली के लोगों की इस रोजमर्रा की परेशानी का समाधान क्यों नहीं निकल पा रहा?
नागरिकों का कहना है कि छुईपाली टोल प्लाजा को लेकर स्थानीय परिस्थितियों का अध्ययन कर ऐसा विकल्प तलाशा जाना चाहिए, जिससे नियमों का पालन भी हो और नियमित स्थानीय यात्रियों पर अनावश्यक आर्थिक भार भी न पड़े।
स्थानीय लोगों की मांग—टोल व्यवस्था की हो समीक्षा
सरायपाली-बासना मार्ग से नियमित आवागमन करने वाले लोगों ने सरकार, एनएचएआई और संबंधित विभाग से टोल व्यवस्था की समीक्षा करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि स्थानीय वाहन चालकों के लिए यदि नियमों के तहत पास, रियायत या अन्य सुविधा उपलब्ध है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक की जाए और पात्र लोगों को आसानी से इसका लाभ मिले।साथ ही स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि वर्तमान व्यवस्था में कोई व्यवहारिक विकल्प संभव है तो उसे लागू करने की दिशा में जनप्रतिनिधियों को पहल करनी चाहिए।
अब जनता पूछ रही—समाधान कब?
छुईपाली टोल प्लाजा का मुद्दा अब केवल कुछ रुपये के टोल शुल्क का सवाल नहीं रह गया है। यह सवाल स्थानीय सुविधा, पारदर्शिता, जनप्रतिनिधियों की सक्रियता और जनता के प्रति जवाबदेही से जुड़ता जा रहा है।
सरायपाली के लोगों का सवाल साफ है—जब क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की आवाज प्रदेश से दिल्ली तक पहुंचती है, तो सरायपाली से महज कुछ किलोमीटर दूर खड़े टोल प्लाजा की परेशानी की आवाज आखिर कब ऊपर तक पहुंचेगी?अब स्थानीय जनता की नजर इस बात पर है कि जनप्रतिनिधि इस मुद्दे को संबंधित विभाग और केंद्र सरकार के समक्ष कब मजबूती से उठाते हैं और छुईपाली टोल से नियमित आवागमन करने वाले स्थानीय लोगों को राहत दिलाने के लिए क्या ठोस पहल सामने आती है।



