
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही,श्रीनिवास सुमेर, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में स्थानांतरण व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। शिक्षक संगठनों और कर्मचारियों के बीच चल रही चर्चाओं ने व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आरोप है कि वर्षों से एक ही स्थान पर पदस्थ शिक्षकों के तबादले के लिए भी कथित तौर पर ‘लेन-देन’ का रास्ता तलाशा जा रहा है। सबसे पीड़ादायक चर्चा उन शिक्षकों को लेकर है, जो गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं और बेहतर उपचार अथवा पारिवारिक परिस्थितियों के कारण स्थानांतरण चाहते हैं।शिक्षक संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रदेश में ऐसे अनेक शिक्षक हैं, जो अपनी पहली नियुक्ति से लेकर 15 से 20 वर्षों तक एक ही स्थान पर सेवाएं दे रहे हैं। किसी ने दूरस्थ क्षेत्र में रहकर बच्चों को पढ़ाया तो किसी ने वर्षों तक पारिवारिक परिस्थितियों से समझौता किया। लेकिन जब वही शिक्षक बीमारी या पारिवारिक जरूरत के समय अपने गृह क्षेत्र अथवा बेहतर उपचार सुविधा वाले स्थान पर जाना चाहता है तो कथित रूप से उसकी राह आसान नहीं रह जाती।इसी बीच शिक्षक समुदाय में अलग-अलग पदों के स्थानांतरण को लेकर कथित ‘रेट’ की चर्चाएं भी सुनाई देने की बात कही जा रही है। चर्चाओं के अनुसार व्याख्याताओं के लिए करीब तीन लाख रुपये, यूआरसीसी और बीआरसीसी जैसे पदों के लिए दो से तीन लाख रुपये तथा जिला शिक्षा अधिकारी स्तर के पद के लिए 15 लाख रुपये तक की कथित मांग किए जाने की बातें सामने आ रही हैं। हालांकि इन रकमों से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।लेकिन सवाल रकम से भी बड़ा है—यदि स्थानांतरण नियम, पात्रता, रिक्त पद और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर होना है, तो फिर शिक्षक समुदाय के बीच कथित ‘रेट’ की चर्चा आखिर क्यों हो रही है?यह सवाल इसलिए भी गंभीर हो जाता है क्योंकि मामला केवल सामान्य स्थानांतरण का नहीं है। शिक्षकों के बीच ऐसी चर्चाएं भी हैं कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे कर्मचारियों को भी उपचार-सुविधा वाले स्थान पर जाने के लिए प्रभाव अथवा कथित आर्थिक लेन-देन की आवश्यकता बताई जा रही है। यदि कहीं ऐसा वास्तव में हो रहा है तो यह प्रशासनिक अनियमितता से आगे बढ़कर मानवीय संवेदनाओं का प्रश्न बन जाता है।जिस शिक्षक ने बीस साल बच्चों का भविष्य संवारा, क्या बीमारी के समय उसके अपने भविष्य की कीमत भी तय होगी?शिक्षा विभाग की व्यवस्था में वरिष्ठता सूचियां, सेवा संबंधी नियम और विभिन्न विभागीय सूचनाएं सार्वजनिक की जाती हैं। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत शिक्षक युक्तियुक्तकरण व्यवस्था में भी पारदर्शी काउंसलिंग और वरीयता के आधार पर पदस्थापना जैसे प्रावधानों की चर्चा होती रही है। ऐसे में यदि व्यवस्था वास्तव में नियम आधारित और पारदर्शी है तो फिर बिचौलियों, सिफारिशों और कथित ‘रेट’ की चर्चाओं को जगह कैसे मिल रही है?सरकार चाहे तो इस पूरे संदेह को दूर करना मुश्किल नहीं है। स्थानांतरण प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन किया जाए, प्रत्येक आवेदन का स्टेटस सार्वजनिक हो, रिक्त पदों की जानकारी उपलब्ध कराई जाए और पात्रता के आधार पर प्राथमिकता सूची सार्वजनिक की जाए। गंभीर बीमारी, दिव्यांगता, पति-पत्नी संबंधी परिस्थितियों तथा लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों के लिए स्पष्ट और सार्वजनिक मानदंड तय किए जाएं।यदि किसी शिक्षक का आवेदन स्वीकार किया गया है तो उसका आधार सामने हो और यदि अस्वीकार किया गया है तो कारण भी दर्ज हो। इससे न केवल व्यवस्था पर भरोसा बढ़ेगा, बल्कि किसी भी कथित बिचौलिया तंत्र की गुंजाइश भी कम होगी।आज सवाल सिर्फ तबादले का नहीं है। सवाल उस शिक्षक की मजबूरी का है, जिसने वर्षों तक शासन की सेवा की और अब अपने अधिकार के लिए व्यवस्था के सामने खड़ा है। सवाल उस परिवार का है, जो गंभीर बीमारी से जूझ रहे शिक्षक के उपचार के लिए बेहतर स्थान चाहता है। और सवाल उस व्यवस्था का है, जो शिक्षक से कर्तव्य की उम्मीद करती है तो क्या उसके अधिकार की रक्षा की जिम्मेदारी भी उसी मजबूती से नहीं निभाई जानी चाहिए?बीस साल की सेवा के बाद भी अगर तबादला सवाल बन जाए, बीमारी के बाद भी राहत सवाल बन जाए और अधिकार पाने के रास्ते में कथित कीमत की चर्चा होने लगे, तो फिर पारदर्शिता का दावा किस मोड़ पर खड़ा है?इन आरोपों की सत्यता जांच का विषय है और बिना प्रमाण किसी व्यक्ति अथवा अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन शिक्षक समुदाय के बीच जिस स्तर पर ये चर्चाएं सामने आ रही हैं, उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करना भी व्यवस्था के हित में नहीं होगा। सरकार को चाहिए कि आरोपों को केवल अफवाह मानकर खारिज करने के बजाय निष्पक्ष जांच कराए। यदि आरोप निराधार हैं तो स्थिति स्पष्ट हो, और यदि कहीं भ्रष्टाचार अथवा बिचौलियों की भूमिका प्रमाणित होती है तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो।क्योंकि अंततः सवाल यही है—तबादला किसी शिक्षक का अधिकार है या किसी की मेहरबानी? और अगर शिक्षक बीमारी से लड़ रहा हो, तो क्या उसे बीमारी से लड़ना है या तबादले की कथित कीमत से?




