
नूर मोहम्मद ,जिला ब्यूरो चीफ (सर्वव्यापी)
मरवाही वनमंडल में वर्ष 2022 में सामने आए कथित करीब 7 करोड़ रुपये के मनरेगा घोटाले को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं।
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, विभागीय कार्रवाई में केवल निचले स्तर के वन कर्मचारियों को निशाना बनाया गया, जबकि मामले के कथित मुख्य आरोपियों पर अब तक कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई। इसे लेकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और सरकारी धन की वसूली की मांग तेज हो गई है।सूत्रों का दावा है कि जांच के बाद कुछ वन कर्मचारियों को निलंबित किया गया और बाद में दो-दो वेतन वृद्धि रोकने जैसी विभागीय कार्रवाई की गई। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल वेतन वृद्धि रोक देने से कथित 7 करोड़ रुपये की सरकारी राशि की भरपाई हो गई?
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, मामले में आराध्या बिल्डिंग मटेरियल सप्लायर के संचालक बाबी शर्मा तथा मनरेगा शाखा से जुड़े ऑपरेटर रामजी नामदेव की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे, लेकिन उनके विरुद्ध अपेक्षित कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। सूत्रों का यह भी दावा है कि जिन निर्माण स्थलों के लिए सामग्री की आपूर्ति का भुगतान किया गया, वहां कई स्थानों पर सामग्री पहुंची ही नहीं थी। मामला उजागर होने के बाद कुछ स्थानों पर सीमित मात्रा में सामग्री डालकर औपचारिकता पूरी करने का प्रयास किया गया।
सूत्रों के मुताबिक विभागीय जांच में वास्तविक जिम्मेदारी तय करने के बजाय छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई केंद्रित रही। वहीं तत्कालीन प्रभारी वनमंडलाधिकारी राकेश मिश्रा की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि पूरे मामले में प्रभावी कानूनी कार्रवाई के बजाय विभागीय स्तर पर मामला सीमित कर दिया गया।
एफआईआर क्यों नहीं हुई?
विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि यदि मनरेगा अधिनियम और वित्तीय अनियमितता के प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई होती, तो सबसे पहले संबंधित आरोपियों के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज होना चाहिए था। लेकिन अब तक ऐसी कोई कार्रवाई सामने नहीं आई। यही कारण है कि पूरे मामले पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है।
फिर सक्रिय वही फर्म?
सूत्रों के अनुसार, जिस फर्म का नाम पहले विवादों में आया था, उसका संचालक कथित रूप से नाम बदलकर वर्तमान में भी मरवाही वनमंडल में सामग्री आपूर्ति का कार्य कर रहा है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन यदि यह सही पाया जाता है तो यह गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय प्रश्न खड़े करता है।
ईओडब्ल्यू में शिकायत
7 करोड़ की वसूली की मांग*विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, पूरे मामले की शिकायत आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) में भी की गई है। शिकायतकर्ताओं की मांग है कि कथित रूप से गबन की गई करीब 7 करोड़ रुपये की राशि की वसूली की जाए तथा पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराई जाए।
जनता पूछ रही है…
– क्या केवल वेतन वृद्धि रोक देना ही 7 करोड़ के कथित घोटाले की सजा है?
– कथित मुख्य आरोपियों पर एफआईआर क्यों नहीं हुई?
– सरकारी राशि की वसूली कब होगी?-
विभागीय जांच में वास्तविक जिम्मेदारों को बचाया गया या नहीं?
– यदि फर्जी आपूर्ति हुई थी तो भुगतान किस आधार पर किया गया?
– यदि शिकायत ईओडब्ल्यू तक पहुंच चुकी है, तो जांच की वर्तमान स्थिति क्या है?



