
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़ चिरमिरी भरतपुर जिले के मनेन्द्रगढ़ वन मंडल में करोड़ों रुपये के विकास कार्यों में कथित अनियमितताओं को लेकर एक बार फिर सवालों का जंगल खड़ा हो गया है। तालाब, स्टॉपडैम, मुनारा निर्माण, फेंसिंग और पौधारोपण जैसे कार्यों में नियमों की अनदेखी तथा वित्तीय गड़बड़ियों के आरोपों ने विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। शिकायतकर्ता एवं एक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार कहना है कि उन्होंने कई बार सक्षम अधिकारियों के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की, लेकिन आज तक निष्पक्ष जांच प्रारंभ नहीं हो सकी।विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, खोंगापानी, मनेन्द्रगढ़, घुटरा, नारायणपुर, छिपछिपी तथा अन्य वन क्षेत्रों में कराए गए विकास कार्यों की गुणवत्ता और भुगतान प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।
विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि जांच आगे बढ़ाने के बजाय मामला लगातार लंबित रखा गया है, जिससे विभाग की कार्यशैली पर संदेह गहराता जा रहा है।शिकायत में आरोप लगाया गया है कि खड़गवां वन परिक्षेत्र में निर्धारित 60×60 सेंटीमीटर गड्ढों के स्थान पर लगभग 30×30 सेंटीमीटर के छोटे गड्ढे खोदे गए। कई स्थानों पर ठूंठ और जड़ों को हटाए बिना पौधारोपण कार्य दर्शाया गया। वहीं दिसंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच कथित रूप से फर्जी वाउचर के माध्यम से भुगतान किए जाने तथा कैम्पा एवं नियमित बजट मद में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप भी लगाए गए हैं।
विश्वसनीय सूत्रों का यह भी कहना है कि फरवरी 2026 में जब शिकायतकर्ता ने मौके पर जानकारी लेने का प्रयास किया, तब संबंधित अधिकारी कैमरा देखकर वहां से चले गए। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित अधिकारियों की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हुई है।
सूत्रों के अनुसार, तालाब, स्टॉपडैम, मुनारा, फेंसिंग और पौधारोपण जैसे कई कार्य मशीनों के माध्यम से कराए जाने के आरोप भी लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि इन सभी कार्यों का स्वतंत्र एजेंसियों से भौतिक सत्यापन कराया जाए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
विश्वसनीय सूत्रों में यह चर्चा भी है कि जांच में हो रही देरी के पीछे कथित “मौखिक आदेश” प्रभावी हैं। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। यदि ऐसा है तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या लिखित नियमों से अधिक प्रभाव मौखिक निर्देशों का हो गया है? यही प्रश्न अब आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन चुका है।
शिकायतकर्ता ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा विजिलेंस तथा किसी अन्य वन वृत्त के वरिष्ठ अधिकारियों की संयुक्त टीम गठित कर प्रत्येक कार्य का भौतिक सत्यापन कराया जाए। साथ ही कैम्पा एवं नियमित बजट के सभी अभिलेखों की जांच कर यदि अनियमितताएं प्रमाणित हों तो संबंधित अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर शासकीय राशि की वसूली सुनिश्चित की जाए।विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, वन विभाग में कमीशनखोरी और ठेकेदारी व्यवस्था को लेकर भी लंबे समय से चर्चाएं होती रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ऐसे में निष्पक्ष जांच ही इन सभी आरोपों की वास्तविकता स्पष्ट कर सकती है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वन क्षेत्रों में विकास कार्य दिखाई तो देते हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता, पारदर्शिता और उपयोगिता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। लोगों का मानना है कि यदि करोड़ों रुपये की योजनाओं पर लगे आरोपों की समयबद्ध और निष्पक्ष जांच नहीं होती, तो इससे जनता का सरकारी व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या जांच वास्तव में होगी या फिर फाइलें “मौखिक आदेशों” के साए में ही दबी रहेंगी? इसका उत्तर केवल निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यपरक जांच ही दे सकती है।



