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भालू हमले के बाद डीएफओ पर कार्रवाई, लेकिन मरवाही के पुराने मामलों में अब भी क्यों खामोशी?वन विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल—कहीं कार्रवाई में दोहरा मापदंड तो नहीं? कांकेर में लापरवाही पर तबादला, वहीं मरवाही में गंभीर आरोपों पर सिर्फ कागजी कार्रवाई और नस्तीबद्ध मामलों का खेल।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों और इंसानी जिंदगी की सुरक्षा को लेकर वन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विभागीय सूत्रों ने बताया कि कांकेर में मादा भालू के हिंसक हमले के दौरान वन विभाग के कथित बेहद लचर और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को सरकार ने गंभीरता से लिया और हालिया तबादला आदेश में कांकेर के डीएफओ रौनक गोयल को वहां से हटा दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है कि जब वन्यजीव और ग्रामीण आमने-सामने हों, तब वन विभाग की जिम्मेदारी केवल घटना के बाद कागजी कार्रवाई करने तक सीमित है या समय रहते मौके पर पहुंचकर इंसानी जान और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उसकी जवाबदेही है?बताया गया कि बीमार शावक की मौत के बाद मादा भालू आक्रामक हो गई और ग्रामीणों पर हमला करने लगी। सूचना मिलने के बावजूद वन विभाग की ओर से तत्काल प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के आरोप सामने आए। स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब ग्रामीणों ने गुस्से में आकर भालू को लाठी-डंडों से पीटना शुरू कर दिया। आरोप है कि उस समय भी वन विभाग की सक्रियता अपेक्षित स्तर पर नजर नहीं आई। परिणाम यह हुआ कि दो ग्रामीणों की जान चली गई और अंततः भालू को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। यानी एक ऐसी स्थिति, जिसे समय रहते नियंत्रित किया जा सकता था, वह इंसान और वन्यजीव दोनों के लिए जानलेवा साबित हुई।कांकेर की इस घटना के बाद सरकार की कार्रवाई को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पहली बार ऐसा स्पष्ट संदेश जाता दिखाई दे रहा है कि वन्यजीवों से जुड़ी घटनाओं में वन विभाग की प्रशासनिक जवाबदेही भी तय हो सकती है। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही या विलंबित प्रतिक्रिया के कारण परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर होती हैं, तो केवल मैदानी कर्मचारियों पर जिम्मेदारी डालकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता। शीर्ष स्तर पर बैठे अधिकारियों की भूमिका और निर्णय लेने की क्षमता पर भी सवाल उठेंगे और जवाबदेही तय करनी होगी।लेकिन कांकेर की कार्रवाई के साथ ही अब मरवाही वन मंडल का मामला भी चर्चा में आ गया है। मरवाही में डीएफओ रहते रौनक गोयल के कार्यकाल को लेकर विभिन्न प्रकार के आरोप सामने आने की बात कही जाती रही है। इन आरोपों पर कार्रवाई के बजाय लंबे समय से केवल कागजी प्रक्रिया चलने की चर्चा है। सवाल यह है कि यदि किसी अधिकारी के खिलाफ गंभीर शिकायतें और आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने क्यों नहीं लाई जाती? और यदि आरोप निराधार हैं तो संबंधित अधिकारी को जांच के माध्यम से क्लीनचिट क्यों नहीं दी जाती? वर्षों तक फाइलों में मामला लंबित रखना आखिर किसके हित में है?विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि मरवाही वन मंडल से जुड़ा दूसरा मामला इससे भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। एक आईएएस अधिकारी के रिश्तेदार बताए जाने वाले एक वन अधिकारी के प्रभारी डीएफओ के रूप में कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार से जुड़े आरोप लगाए गए थे। आरोपों की जांच के दौरान साक्ष्य सामने आने की बात भी कही गई, लेकिन इसके बावजूद मामला अंततः नस्तीबद्ध कर दिए जाने की चर्चा है। यदि वास्तव में किसी जांच में साक्ष्य उपलब्ध थे और फिर भी प्रकरण को बंद कर दिया गया, तो सवाल सिर्फ संबंधित अधिकारी का नहीं बल्कि उस पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया का है जिसके तहत गंभीर आरोपों वाली फाइल को बंद करने का निर्णय लिया गया।यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वन विभाग में जवाबदेही सभी अधिकारियों के लिए समान है? कांकेर में कथित लापरवाही पर सरकार ने तत्काल प्रशासनिक कार्रवाई की, यह निश्चित रूप से स्वागत योग्य कदम है। लेकिन यदि मरवाही जैसे मामलों में गंभीर आरोपों के बावजूद केवल कागजी कार्रवाई चलती रहे, जांच लंबी खिंचती रहे या साक्ष्य होने के बावजूद प्रकरण नस्तीबद्ध कर दिया जाए, तो स्वाभाविक रूप से विभाग की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे।वन विभाग की जिम्मेदारी केवल जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। जंगल से लगे गांवों में रहने वाले हजारों ग्रामीणों की जिंदगी भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है। मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की स्थिति में विभाग को पहले से रणनीति बनानी होती है, संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी रखनी होती है, सूचना मिलने पर त्वरित प्रतिक्रिया देनी होती है और ग्रामीणों तथा वन्यजीव दोनों को सुरक्षित रखने के लिए तत्काल कदम उठाने होते हैं। कांकेर की घटना ने इसी व्यवस्था की कमजोरी को उजागर किया है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि एक बीमार शावक की मौत के बाद आक्रामक हुई मादा भालू की गतिविधियों की जानकारी समय रहते विभाग को मिल गई थी, फिर भी यदि कार्रवाई में देरी हुई तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि गंभीर मानवीय और वन्यजीव सुरक्षा का प्रश्न है। ग्रामीणों का भय और आक्रोश भी अचानक पैदा नहीं होता। जब कोई हिंसक वन्यजीव लगातार आबादी के बीच पहुंचता है और लोगों को खतरा महसूस होता है, तब विभाग की तत्काल मौजूदगी ही स्थिति को बिगड़ने से रोक सकती है।कांकेर में दो ग्रामीणों और एक वन्यजीव की मौत के बाद सरकार ने जिस तरह डीएफओ स्तर पर कार्रवाई की है, उससे यह संदेश जरूर गया है कि जिम्मेदारी तय की जा सकती है। लेकिन अब इस संदेश को पूरे वन विभाग में समान रूप से लागू करने की जरूरत है। विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि मरवाही वन मंडल में डीएफओ रहते लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए और जिन मामलों में जांच हुई है, उनकी फाइलों की भी स्वतंत्र रूप से समीक्षा की जानी चाहिए। खासकर उन मामलों में, जहां साक्ष्य होने के बावजूद प्रकरण नस्तीबद्ध किए जाने के आरोप हैं, वहां यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस अधिकारी ने किस आधार पर मामला बंद करने का निर्णय लिया।सरकार यदि वास्तव में वन विभाग में जीरो टॉलरेंस और जवाबदेही की नीति लागू करना चाहती है, तो कार्रवाई केवल तबादले तक सीमित नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक गंभीर शिकायत की समयबद्ध जांच, दोषी पाए जाने पर विभागीय कार्रवाई और निर्दोष पाए जाने पर स्पष्ट क्लीनचिट—यही पारदर्शी व्यवस्था का आधार होना चाहिए। इससे न केवल अधिकारियों में जवाबदेही बढ़ेगी बल्कि विभाग के प्रति आम लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा।कांकेर की घटना ने एक बड़ा सबक दिया है—वन्यजीव और इंसान दोनों की जिंदगी की कीमत है। वन विभाग के अधिकारी यदि समय पर सक्रिय रहें तो कई बार संघर्ष को टाला जा सकता है। लेकिन अगर सूचना के बावजूद अधिकारी और अमला मौके पर देर से पहुंचे, तो परिणाम किसी के पक्ष में नहीं होता। कांकेर में दो ग्रामीणों की मौत और भालू की मौत इसी विफलता की दर्दनाक तस्वीर है।अब देखना यह है कि सरकार कांकेर की कार्रवाई को केवल एक घटना तक सीमित रखती है या वन विभाग में लंबित पुराने मामलों की भी निष्पक्ष समीक्षा कर जवाबदेही की एक समान व्यवस्था स्थापित करती है। क्योंकि सवाल केवल रौनक गोयल के तबादले का नहीं है; सवाल यह है कि क्या वन विभाग में प्रभाव, पद और रिश्तों से परे सभी अधिकारियों के लिए एक समान नियम लागू होंगे?यदि सरकार इस सवाल का जवाब कार्रवाई से देती है, तो कांकेर की घटना वास्तव में वन विभाग के लिए एक बड़े सुधार की शुरुआत साबित हो सकती है।

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