तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के हजारों नगर सैनिकों के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला उम्मीद की बड़ी किरण लेकर आया था, लेकिन आदेश के महीनों बाद भी वेतन एवं सेवा सुविधाओं को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं होने से जवानों में नाराजगी बढ़ती नजर आ रही है। नगर सैनिकों का दावा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्धारित समयसीमा में आदेश का पालन करते हुए उन्हें पुलिस कर्मियों के समकक्ष वेतन और संबंधित सुविधाएं देने के निर्देश दिए थे, लेकिन करीब पांच महीने बीतने के बाद भी अपेक्षित लाभ उन्हें नहीं मिल पाया है। इसी को लेकर अब शासन के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई का रास्ता भी अपनाया गया है।दरअसल, नगर सैनिकों की समान काम के लिए समान वेतन की मांग का विवाद नया नहीं है। न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्देशों का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें होमगार्ड जवानों को पुलिस कर्मियों के न्यूनतम वेतन के अनुरूप ड्यूटी भत्ता देने की बात कही गई थी। 4 मई 2016 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने ‘minimum of the pay’ को मूल वेतन, ग्रेड पे, महंगाई भत्ता और वॉशिंग अलाउंस के संदर्भ में स्पष्ट किया था।छत्तीसगढ़ में भी यह मामला अदालतों तक पहुंचा। 2023 के एक हाईकोर्ट आदेश में राज्य के होमगार्डों को पुलिस विभाग के सबसे निचले कैडर के समकक्ष वेतन देने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने उस समय उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर सहायक आरक्षक के वेतन को संदर्भ बनाया और आदेश के अनुपालन के लिए चार महीने की समयसीमा निर्धारित की थी।इसके बाद 2026 में मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। प्रकाशित न्यायिक रिपोर्टों के अनुसार राज्य सरकार की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका खारिज होने के बाद हाईकोर्ट के आदेश को कायम रखा गया और उसके पालन के लिए तीन महीने की समयसीमा बताई गई। इससे प्रदेश के हजारों नगर सैनिकों में यह उम्मीद जगी कि वर्षों से चली आ रही समान वेतन और सेवा सुविधाओं की मांग अब निर्णायक रूप से पूरी होगी।लेकिन नगर सैनिकों का कहना है कि निर्धारित अवधि गुजरने के बाद भी उनकी मूल समस्या जस की तस बनी हुई है। जवानों के मुताबिक वे कानून-व्यवस्था से जुड़े कार्यों, वीआईपी ड्यूटी, सुरक्षा व्यवस्था, आपदा प्रबंधन, चुनाव ड्यूटी और पुलिस के साथ विभिन्न जिम्मेदारियों में लगातार सेवाएं देते हैं। उनका दावा है कि काम की जिम्मेदारियों के मुकाबले उन्हें अभी भी ऐसी सेवा सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, जैसी नियमित सरकारी कर्मचारियों को प्राप्त होती हैं।नगर सैनिकों की सबसे बड़ी चिंता केवल वर्तमान मानदेय नहीं बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद का भविष्य भी है। जवानों का कहना है कि उन्हें नियमित सरकारी कर्मचारियों की तरह पेंशन, पीएफ अथवा अन्य दीर्घकालिक सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता। ऐसे में 60 वर्ष की उम्र में सेवा समाप्त होने के बाद परिवार के भरण-पोषण को लेकर असुरक्षा बनी रहती है। कुछ सेवानिवृत्त नगर सैनिकों के निजी सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करने की बात भी जवानों द्वारा कही जा रही है।नगर सैनिकों का सवाल है कि यदि उनसे पुलिस व्यवस्था के साथ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई जा रही हैं, चुनावों के दौरान दूसरे राज्यों तक ड्यूटी लगाई जाती है और आपात परिस्थितियों में उनकी सेवाएं ली जाती हैं, तो उनकी सेवा शर्तों और सामाजिक सुरक्षा में इतना बड़ा अंतर क्यों बना हुआ है?इसी असंतोष के बीच अब नगर सैनिकों के बीच आंदोलन की चर्चा भी तेज हो गई है। जवानों के अनुसार दिसंबर में दिल्ली के जंतर-मंतर पर देशभर के नगर सैनिकों को एकत्रित कर प्रदर्शन करने की योजना पर विचार किया जा रहा है और 12 दिसंबर की तारीख प्रस्तावित होने की बात सामने आ रही है। हालांकि इस प्रस्तावित आंदोलन की अंतिम आधिकारिक पुष्टि संबंधित संगठन या आयोजकों की ओर से होना बाकी है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नगर सैनिकों ने शासन के खिलाफ अवमानना याचिका दायर किए जाने की बात कही है। अब आने वाले समय में न्यायालय इस बात की समीक्षा कर सकता है कि संबंधित आदेश का कितना और किस रूप में अनुपालन हुआ है।यह पूरा विवाद शासन के सामने भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—यदि न्यायालय ने नगर सैनिकों के वेतन और सेवा सुविधाओं को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं, तो उनके प्रभावी क्रियान्वयन में देरी क्यों हो रही है? वहीं नगर सैनिकों के लिए भी यह लड़ाई केवल वेतन बढ़ाने की नहीं, बल्कि सम्मानजनक सेवा शर्तों, सामाजिक सुरक्षा और सेवानिवृत्ति के बाद सुरक्षित भविष्य की मांग बनती जा रही है।अब निगाहें सरकार की अगली कार्रवाई और न्यायालय में चल रही अवमानना कार्यवाही पर टिकी हैं। नगर सैनिकों को उम्मीद है कि वर्षों से लंबित समान वेतन और सेवा सुविधाओं का विवाद अब केवल आदेशों और फाइलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जमीन पर भी उसका वास्तविक लाभ दिखाई देगा।




