
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) की भर्तियों को लेकर एक बार फिर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था सवालों के घेरे में है। वर्ष 2021-22 की भर्ती प्रक्रिया को लेकर कथित भाई-भतीजावाद, पेपर लीक और आर्थिक अनियमितताओं के आरोपों की जांच सीबीआई के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा भी मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं से किए जाने की खबरों के बीच एक बड़ा प्रश्न फिर सामने खड़ा हो गया है—जब 2021-22 की भर्ती पर सत्ता पक्ष के नेता खुलकर सवाल उठा रहे हैं, तब वर्ष 2003 के बहुचर्चित सीजीपीएससी भर्ती विवाद पर वही मुखरता क्यों दिखाई नहीं देती?
वर्ष 2003 की भर्ती प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि स्केलिंग सिस्टम में कथित हेरफेर के माध्यम से कई अपात्र अभ्यर्थियों का चयन डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर किया गया। यह मामला वर्षों से न्यायालयों में विचाराधीन रहा और वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में लंबित बताया जाता है।
इस पूरे विवाद पर अंतिम न्यायिक निर्णय अभी आना बाकी है।सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि भर्ती प्रक्रिया पर इतने गंभीर आरोप वर्षों से न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं, तो उन चयनों के आधार पर आगे की प्रशासनिक पदोन्नतियों और जिम्मेदारियों का क्या होगा? जिन अधिकारियों ने उसी चयन प्रक्रिया के आधार पर वर्षों तक सेवा दी और बाद में उच्च पदों तक पहुंचे, उनके संबंध में अंतिम न्यायिक निर्णय का प्रभाव किस प्रकार पड़ेगा, यह भी एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है।
हाल के वर्षों में 2021-22 भर्ती विवाद ने राजनीतिक बहस को नई दिशा दी है। विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों अपने-अपने तर्क रख रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारदर्शिता की बात की जाती है, तो जांच और जवाबदेही का पैमाना सभी भर्ती प्रक्रियाओं पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
केवल नई भर्तियों पर कठोर रुख और पुराने मामलों पर मौन, व्यवस्था की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।इसी संदर्भ में यह चर्चा भी तेज है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय आने में अत्यधिक विलंब होता है और इस बीच संबंधित अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं, तो न्याय का वास्तविक उद्देश्य किस हद तक पूरा हो पाएगा। न्याय में विलंब को लेकर समय-समय पर उठती चिंताएं इस मामले में भी प्रासंगिक दिखाई देती हैं।
सूत्रों के अनुसार, इस प्रकरण में एक विशेष लोक अदालत के माध्यम से समाधान का प्रयास भी हुआ था, किंतु याचिकाकर्ताओं द्वारा समझौते से इंकार किए जाने की बातें सामने आईं। हालांकि, इस पूरे प्रकरण का अंतिम और बाध्यकारी निष्कर्ष सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से ही स्पष्ट होगा।
संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी होती है। लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाओं से चयनित अधिकारी शासन-प्रशासन की रीढ़ माने जाते हैं। ऐसे में यदि किसी भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि समयबद्ध और पारदर्शी न्यायिक प्रक्रिया ही जनता का विश्वास कायम रख सकती है।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या वर्ष 2003 का बहुचर्चित विवाद भी उसी गंभीरता से अपने अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचेगा, जैसी अपेक्षा वर्ष 2021-22 के मामलों में की जा रही है? क्या न्यायालय का निर्णय समय रहते आएगा, या फिर यह मामला भी न्यायिक इतिहास के सबसे लंबे लंबित विवादों में दर्ज होकर रह जाएगा?
प्रदेश की जनता, अभ्यर्थी और प्रशासनिक व्यवस्था—तीनों की निगाहें अब सर्वोच्च न्यायालय की ओर हैं। अंतिम निर्णय ही तय करेगा कि वर्षों से उठ रहे आरोपों में कितना तथ्य है और भविष्य में लोक सेवा आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता एवं विश्वसनीयता को और मजबूत बनाने के लिए किन सुधारों की आवश्यकता है।




