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तीन-चार साल से एक ही जगह जमे अफसर, तबादले की बारी कब?

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक व्यवस्था को पारदर्शी, निष्पक्ष और प्रभावी बनाए रखने के लिए समय-समय पर अधिकारियों के स्थानांतरण किए जाते हैं, लेकिन प्रदेश में ऐसे कई डिप्टी कलेक्टर, जॉइंट कलेक्टर और अतिरिक्त कलेक्टर स्तर के अधिकारी अब भी एक ही जिले में लंबे समय से पदस्थ हैं। कई अधिकारियों को एक ही जिले में पदस्थ रहते हुए तीन साल से अधिक समय हो चुका है, जबकि कुछ जिलों में अधिकारियों की पदस्थापना अवधि चार साल तक पहुंच चुकी है। इसके बावजूद इनके स्थानांतरण को लेकर शासन स्तर पर कोई स्पष्ट पहल दिखाई नहीं दे रही है। ऐसे में प्रशासनिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि आखिर सरकार इन अधिकारियों को एक ही स्थान पर इतने लंबे समय तक रखने की वजह क्या है और इनके तबादले की बारी कब आएगी?राज्य में जब भी स्थानांतरण सूची जारी होती है, तब बड़ी संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों को इधर से उधर किया जाता है। कई अधिकारियों की पदस्थापना अवधि पूरी होने का हवाला देकर उनका तबादला किया जाता है, वहीं दूसरी ओर ऐसे अधिकारियों को लेकर कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आती, जो तीन से चार वर्ष अथवा उससे अधिक समय से एक ही जिले में महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। इससे स्थानांतरण नीति की समानता और उसके वास्तविक क्रियान्वयन पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। यदि किसी अधिकारी की पदस्थापना अवधि पूरी हो चुकी है तो सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था के तहत उसके स्थानांतरण पर विचार होना चाहिए, लेकिन यदि किसी विशेष प्रशासनिक आवश्यकता के कारण उसे उसी जिले में बनाए रखा गया है तो सरकार को उसका कारण भी स्पष्ट करना चाहिए।डिप्टी कलेक्टर, जॉइंट कलेक्टर और अतिरिक्त कलेक्टर जैसे पद जिला प्रशासन में बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इन अधिकारियों के पास राजस्व, कानून-व्यवस्था, निर्वाचन, प्रशासनिक समन्वय सहित कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होती हैं। ऐसे पदों पर किसी अधिकारी की लंबे समय तक एक ही जिले में पदस्थापना होने से स्थानीय प्रशासनिक तंत्र के साथ उसका संपर्क और प्रभाव स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। यही वजह है कि प्रशासनिक पारदर्शिता और निष्पक्षता की दृष्टि से महत्वपूर्ण पदों पर समय-समय पर अधिकारियों का स्थानांतरण किया जाना जरूरी माना जाता है।प्रदेश में स्थानांतरण को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अलग-अलग अधिकारियों के लिए अलग-अलग मापदंड क्यों दिखाई देते हैं? कुछ अधिकारी अपेक्षाकृत कम समय में एक जिले से दूसरे जिले भेज दिए जाते हैं, जबकि कुछ अधिकारी वर्षों तक उसी जिले में बने रहते हैं। यदि यह प्रशासनिक आवश्यकता है तो सरकार को इसकी स्पष्ट वजह बतानी चाहिए और यदि यह सामान्य नीति का हिस्सा नहीं है तो फिर लंबे समय से जमे अधिकारियों के स्थानांतरण पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा है, इसका जवाब भी शासन को देना चाहिए।लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थापना को लेकर यह आशंका भी बनी रहती है कि कहीं स्थानीय स्तर पर किसी अधिकारी की मजबूत पकड़ तो विकसित नहीं हो गई है। प्रशासनिक अधिकारियों का जनप्रतिनिधियों, स्थानीय प्रभावशाली लोगों और विभिन्न संस्थाओं से लगातार संपर्क रहता है। ऐसे में लंबे समय तक एक ही जिले में पदस्थ रहने से प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि किसी अधिकारी पर केवल लंबे समय तक पदस्थ रहने के आधार पर किसी प्रकार का आरोप नहीं लगाया जा सकता, लेकिन शासन की जिम्मेदारी जरूर बनती है कि वह ऐसी स्थिति पैदा ही न होने दे, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठें।सरकार की ओर से सुशासन, पारदर्शिता और प्रशासनिक कसावट की बात लगातार कही जाती है। ऐसे में स्थानांतरण व्यवस्था भी इन्हीं सिद्धांतों के अनुरूप दिखाई देनी चाहिए। यदि सरकार ने अधिकारियों की पदस्थापना अवधि का रिकॉर्ड व्यवस्थित रखा है तो तीन-चार साल से एक ही जिले में पदस्थ अधिकारियों की पहचान करना कोई मुश्किल काम नहीं है। जरूरत केवल इतनी है कि शासन उस रिकॉर्ड के आधार पर समान नीति के तहत निर्णय ले। यदि कुछ अधिकारियों को विशेष परिस्थितियों में लंबे समय तक उसी जिले में रखना आवश्यक है तो उसका उल्लेख भी प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट किया जा सकता है।अब जरूरत इस बात की है कि राज्य सरकार सभी जिलों में डिप्टी कलेक्टर, जॉइंट कलेक्टर और अतिरिक्त कलेक्टर स्तर के अधिकारियों की वर्तमान पदस्थापना अवधि की समीक्षा करे। किस अधिकारी को एक जिले में कितने वर्ष हो चुके हैं, किन अधिकारियों ने निर्धारित अवधि पूरी कर ली है और किन अधिकारियों को विशेष परिस्थितियों में उसी स्थान पर बनाए रखा गया है, इसकी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। इससे न केवल स्थानांतरण व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी बल्कि उन अधिकारियों में भी भरोसा कायम होगा, जो लंबे समय से स्थानांतरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं।प्रशासनिक व्यवस्था में स्थानांतरण कोई दंड नहीं बल्कि व्यवस्था को गतिशील बनाए रखने का सामान्य माध्यम है। इसलिए लंबे समय से एक ही जिले में जमे अधिकारियों की पदस्थापना की समीक्षा करना सरकार की प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए। खासकर तब, जब सरकार स्वयं निष्पक्ष प्रशासन और पारदर्शी व्यवस्था को अपनी प्राथमिकता बताती है। ऐसे में यह सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है कि आखिर तीन-चार साल से एक ही जिले में पदस्थ अधिकारियों के मामलों में स्थानांतरण नीति कब लागू होगी?प्रदेश में स्थानांतरण की सूची जब भी जारी होती है, तब अधिकारी-कर्मचारी अपने नाम और पदस्थापना को लेकर उम्मीद लगाए रहते हैं। लेकिन यदि कुछ अधिकारियों को लगातार सूची से बाहर रखा जाता है तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे कि क्या उनके लिए कोई अलग मापदंड है? क्या उन्हें प्रशासनिक आवश्यकता के नाम पर लगातार संरक्षण मिल रहा है? या फिर शासन के स्तर पर उनकी पदस्थापना अवधि की समीक्षा ही नहीं हो रही है? इन सवालों का जवाब सरकार को देना चाहिए।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को केवल स्थानांतरण आदेश जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरी स्थानांतरण व्यवस्था की समीक्षा करते हुए एक स्पष्ट और समान नीति के तहत अधिकारियों की पदस्थापना अवधि निर्धारित करनी चाहिए। यदि तीन वर्ष या चार वर्ष से एक ही स्थान पर पदस्थ अधिकारियों के लिए कोई विशेष प्रावधान है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए और यदि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है तो फिर लंबे समय से एक ही जगह जमे अधिकारियों के तबादले पर सरकार को निर्णय लेना चाहिए। आखिरकार सवाल किसी एक अधिकारी के तबादले का नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था में समानता, पारदर्शिता और निष्पक्षता का है।अब प्रदेश में चर्चा यही है कि सरकार ने जिन अधिकारियों को वर्षों पहले पदस्थ किया था, क्या उन्हें यह बताना भी भूल गई है कि प्रशासन में स्थानांतरण नाम की कोई व्यवस्था होती है? यदि नहीं, तो फिर तीन-चार साल से एक ही जिले में जमे अधिकारियों की फाइल कब खुलेगी और सरकार की स्थानांतरण नीति का पहिया उनके मामले में कब घूमेगा?

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