
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन को लेकर भाजपा द्वारा ‘आशीर्वाद का दीया’ जैसे अभियान चलाने की पहल पर अब सवाल उठने लगे हैं। प्रधानमंत्री के प्रति सम्मान और शुभकामनाएं अपनी जगह हैं, लेकिन सवाल यह है कि आशीर्वाद आखिर दिल से लिया जाता है या फिर सरकारी आयोजन की तरह लोगों से दिलवाया जाता है?आशीर्वाद किसी आदेश, अपील या अभियान का विषय नहीं होता। यह व्यक्ति के प्रति सम्मान, स्नेह और विश्वास से स्वतः निकलने वाली भावना है। जब किसी राजनीतिक दल द्वारा इसे अभियान का रूप देकर सरकारी तंत्र और आयोजनों के माध्यम से व्यापक रूप देने की कोशिश की जाती है, तो सहज रूप से सवाल उठता है कि यह जनभावना है या राजनीतिक प्रदर्शन?प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं और उनके जन्मदिन पर देशभर से शुभकामनाएं मिलना स्वाभाविक है। लेकिन भाजपा को यह समझना होगा कि जनता के दिल में किसी नेता के लिए सम्मान दीपक जलाने के निर्देश से नहीं, बल्कि उसके काम और व्यवहार से पैदा होता है।‘आशीर्वाद का दीया’ यदि लोगों की स्वेच्छा और आत्मीयता से जलता है तो उसका अपना महत्व है, लेकिन यदि सरकारी आयोजन, प्रशासनिक मशीनरी अथवा राजनीतिक दबाव के माहौल में इसे व्यापक अभियान का रूप दिया जाता है, तो यही पहल भाजपा के लिए राजनीतिक उपलब्धि के बजाय फजीहत का कारण भी बन सकती है।राजनीति में भावनाओं का सम्मान होना चाहिए, उनका प्रबंधन नहीं। जनता जिसे आशीर्वाद देना चाहती है, वह अपने मन से देगी। क्योंकि आशीर्वाद मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है; और दिल का दीपक आदेश से नहीं, विश्वास से जलता है।




