
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
बारिश के बीच खेतों का निरीक्षण करते अफसरों की यह तस्वीर इन दिनों चर्चा का विषय बन सकती है। तस्वीर में दो नगर सैनिक हाथों में बड़ी-बड़ी छतरियां थामे अफसरों को बारिश से बचाते नजर आ रहे हैं, जबकि अधिकारी मौके पर खड़े होकर निरीक्षण और आपसी चर्चा में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं।सवाल यह नहीं कि बारिश में अफसरों को छतरी क्यों दी गई, सवाल यह है कि क्या सरकारी अमले में ड्यूटी की प्राथमिकताएं इतनी बदल गई हैं कि मैदानी काम के दौरान सुरक्षा और व्यवस्था संभालने वाले जवान ही अफसरों के लिए छतरीदार बन जाएं?बारिश में खेतों और ग्रामीण इलाकों का निरीक्षण निश्चित रूप से जरूरी हो सकता है। अधिकारी मौके की वास्तविक स्थिति देखने पहुंचते हैं, लेकिन इस तस्वीर ने सरकारी व्यवस्था में अधिकारी और अधीनस्थ कर्मचारियों की भूमिका को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि नगर सैनिकों की तैनाती कानून-व्यवस्था, सुरक्षा अथवा अन्य जिम्मेदारियों के लिए है, तो क्या उन्हें अधिकारियों के लिए छतरी पकड़ने जैसे काम में लगाया जाना उनकी ड्यूटी का हिस्सा है?तस्वीर का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि अफसर निरीक्षण कर रहे हैं और जवान छतरी संभाल रहे हैं। यानी बारिश का असर सब पर है, लेकिन उससे बचाव की जिम्मेदारी कुछ चुनिंदा कर्मचारियों के कंधों पर दिखाई दे रही है।अब जिम्मेदार अधिकारियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि मौके पर मौजूद नगर सैनिकों को किस आदेश के तहत लगाया गया था? क्या उन्हें इसी उद्देश्य से तैनात किया गया था या मौके पर तत्काल व्यवस्था के तौर पर उनसे यह काम लिया गया? यदि यह नियमित व्यवस्था बनती जा रही है तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी कर्मचारी अफसरों की सुविधा के लिए हैं या निर्धारित शासकीय दायित्व निभाने के लिए?बेशक, एक तस्वीर से पूरी व्यवस्था पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन तस्वीर सवाल जरूर पूछती है। और लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल पूछना ही जवाबदेही की पहली सीढ़ी है।**बारिश में खेत देखने पहुंचे अफसरों को छतरी मिल गई, लेकिन तस्वीर ने व्यवस्था के सिर पर कई सवालों की बारिश जरूर कर दी है।**




