
विकास नंद/ सर्वव्यापी
सरायपाली आयुर्वेद चिकित्सा महासंघ जिला महासमुंद एवं आयुर्वेद चिकित्सक महासंघ के उपाध्यक्ष डॉ. देवेंद्र कुमार देवता ने कहा है कि बी.ए.एम.एस. (BAMS) सहित भारतीय चिकित्सा पद्धति के विधिवत पंजीकृत चिकित्सकों को “झोलाछाप” या “फर्जी डॉक्टर” कहना न केवल उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाता है, बल्कि यह कानून का उल्लंघन भी माना जाएगा। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में अब संबंधित व्यक्तियों, संस्थाओं अथवा मीडिया संगठनों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
डॉ. देवता ने बताया कि भारतीय चिकित्सा पद्धति राष्ट्रीय आयोग (NCISM) ने राष्ट्रीय आयोग अधिनियम-2020 के तहत एक महत्वपूर्ण परिपत्र जारी कर स्पष्ट किया है कि बी.ए.एम.एस., बी.यू.एम.एस., बी.एस.एम.एस. एवं बी.एस.आर.एम.एस. जैसी मान्यता प्राप्त डिग्रियां हासिल कर राज्य परिषदों में विधिवत पंजीकृत चिकित्सकों को कानूनन चिकित्सा व्यवसाय करने का अधिकार प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम, 1970 तथा एनसीआईएसएम अधिनियम, 2020 के प्रावधानों के अनुसार पंजीकृत चिकित्सकों की विधिक स्थिति सुरक्षित है और वे निर्धारित अधिकारों के अनुरूप चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने के लिए अधिकृत हैं।
डॉ. देवता के अनुसार, आयोग ने अपने परिपत्र में कहा है कि किसी भी व्यक्ति, संस्था, मीडिया संगठन या अन्य प्राधिकरण द्वारा पंजीकृत आयुर्वेद चिकित्सकों को “झोलाछाप” अथवा “फर्जी डॉक्टर” कहना एनसीआईएसएम अधिनियम-2020 की भावना के विपरीत है।
ऐसा करना संबंधित चिकित्सकों के व्यावसायिक सम्मान और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा।उन्होंने बताया कि आयोग ने सभी नागरिकों, संस्थाओं और मीडिया से अपील की है कि भारतीय चिकित्सा पद्धति के विधिवत पंजीकृत चिकित्सकों के लिए सम्मानजनक भाषा का प्रयोग करें तथा उनकी कानूनी मान्यता और पेशेवर गरिमा का सम्मान सुनिश्चित करें।
डॉ. देवता ने कहा कि शासन के निर्देशानुसार बी.ए.एम.एस. चिकित्सकों को निर्धारित दायरे में लगभग 150 से 200 प्रकार की एलोपैथिक दवाओं के उपयोग की अनुमति है। इसके बावजूद जानकारी के अभाव में कई बार उन्हें “झोलाछाप” कह दिया जाता है। उन्होंने कहा कि एनसीआईएसएम के नवीन परिपत्र के बाद ऐसे अपमानजनक शब्दों के प्रयोग पर संबंधित लोगों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई की जा सकेगी।




