
नूर मोहम्मद,जिला ब्यूरोचीफ,सर्वव्यापी,


प्रदेश के पत्रकारों एवं मीडिया कर्मियों के हित संरक्षण, सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और कल्याणकारी सुविधाओं की मांग को लेकर ग्लोबल जर्नलिस्ट एंड मीडिया संघ छत्तीसगढ़ के प्रदेश महासचिव एवं सर्वव्यापी के प्रधान संपादक तरुण कौशिक द्वारा उठाए गए मुद्दे पर छत्तीसगढ़ शासन हरकत में आया।
मुख्यमंत्री सचिवालय से मामला जनसंपर्क विभाग को भेजा गया, विभाग ने फाइल संचालित की, नोटशीट तैयार हुई और इसके बाद दो बार आधिकारिक पत्र एवं स्मरण पत्र जारी किए गए, लेकिन उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार जनसंपर्क संचालनालय स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई आज तक पूरी नहीं हो सकी है।
सबसे अहम बात यह है कि जनसंपर्क विभाग स्वयं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रभार वाला विभाग है। ऐसे में मुख्यमंत्री सचिवालय से प्राप्त प्रकरण पर भी यदि कार्रवाई लंबित रहती है, तो यह विभागीय जवाबदेही और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
तरुण कौशिक की मांग पर शासन ने शुरू की प्रक्रिया
दस्तावेज़ों के अनुसार प्रदेश महासचिव तरुण कौशिक ने पत्रकारों एवं मीडिया कर्मियों के हित संरक्षण, सुरक्षा, सामाजिक सम्मान तथा कल्याणकारी सुविधाओं को लेकर विस्तृत ज्ञापन मुख्यमंत्री को सौंपा था।
मुख्यमंत्री सचिवालय ने इस विषय को गंभीरता से लेते हुए जनसंपर्क विभाग को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजा।25 जून 2026 की विभागीय नोटशीट में स्पष्ट उल्लेख है कि आयुक्त, जनसंपर्क संचालनालय को आवश्यक कार्रवाई करते हुए आवेदक तथा मुख्यमंत्री कार्यालय को अवगत कराने और जनदर्शन पोर्टल पर जानकारी अपलोड करने के निर्देश दिए जाएं।
कार्रवाई नहीं हुई तो भेजा गया “आज ही” स्मरण पत्र
जब निर्धारित कार्रवाई की जानकारी प्राप्त नहीं हुई, तब जनसंपर्क विभाग के उप सचिव ने 07 जुलाई 2026 को “स्मरण पत्र-आज ही” जारी किया। इस पत्र में स्पष्ट निर्देश दिए गए कि तत्काल आवश्यक कार्रवाई कर उसकी जानकारी मुख्यमंत्री कार्यालय तथा जनदर्शन पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाए।सवाल यह है कि यदि पहला पत्र पर्याप्त था, तो स्मरण पत्र जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? और यदि स्मरण पत्र भी जारी हो गया, तो फिर कार्रवाई आखिर किस स्तर पर अटक गई?
आयुक्त कार्यालय पर उठ रहे गंभीर सवाल
उपलब्ध दस्तावेज़ों से यह संकेत मिलता है कि शासन स्तर से कार्रवाई आगे बढ़ाने के प्रयास हुए, लेकिन जनसंपर्क संचालनालय स्तर पर अपेक्षित प्रगति नहीं दिखाई दी। यदि वास्तव में आज तक कार्रवाई लंबित है, तो यह स्थिति जनसंपर्क आयुक्त कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
प्रश्न उठ रहे हैं—क्या मुख्यमंत्री सचिवालय से प्राप्त पत्रों को भी प्राथमिकता नहीं दी जाती?दो-दो बार शासन के निर्देशों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई?पत्रकार हितों से जुड़े संवेदनशील विषय को आखिर किस कारण लंबित रखा गया?क्या विभागीय स्तर पर जवाबदेही तय होगी?
पत्रकारों में बढ़ रही नाराज़गी*पत्रकार संगठनों का मानना है कि जब पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और कल्याण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर भी कार्रवाई में विलंब होता है, तो इससे शासन की मंशा पर नहीं बल्कि क्रियान्वयन तंत्र की कार्यशैली पर सवाल उठते हैं। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री स्तर से संज्ञान लिए गए मामलों को अनावश्यक रूप से लंबित रखना उचित नहीं है। अ
ब सबकी निगाहें जनसंपर्क आयुक्त के स्पष्टीकरण पर टिकी हैं। यदि कार्रवाई वास्तव में लंबित है, तो उसके कारण सार्वजनिक किए जाने चाहिए और यदि कार्रवाई हो चुकी है, तो उसकी जानकारी भी पारदर्शी तरीके से सामने लाई जानी चाहिए।



