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संदेशों का जवाब देते हैं बड़े साहब, फोन भी उठाते हैं जनाब,एक साहब ऐसे भी हैं—न संदेश का जवाब, न फोन का हिसाब!वरिष्ठों के संदेशों की अनदेखी, युवा आईएफएस अफसर के रवैये पर उठे सवाल।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में अधिकारियों के व्यवहार और आमजन से संवाद को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा का विषय बनता नजर आ रहा है। विभाग के शीर्ष स्तर पर पदस्थ वरिष्ठ अधिकारी प्रतिष्ठित जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ पत्रकारों और सम्मानित नागरिकों के वाट्सएप संदेशों का जवाब देने के साथ-साथ आवश्यकता पड़ने पर उनके फोन भी रिसीव करते हैं, वहीं इसी विभाग में पदस्थ एक युवा आईएफएस अधिकारी के कथित व्यवहार को लेकर इसके ठीक उलट तस्वीर सामने आने की बात कही जा रही है।बताया जा रहा है कि विभाग में पदस्थ यह युवा अधिकारी वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों अथवा सम्मानित लोगों द्वारा भेजे गए संदेशों का जवाब देना तो दूर, कई बार उनके फोन तक रिसीव नहीं करते। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर प्रशासनिक पद की गरिमा क्या केवल पद और अधिकार तक सीमित है या संवाद और शिष्टाचार भी उसका अभिन्न हिस्सा है?यहां गौर करने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव विकास शील, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार पिंगुआ और पीसीसीएफ अरुण कुमार पाण्डेय जैसे वरिष्ठ अधिकारी स्वयं संवाद को महत्व देते हैं। ऐसे में उसी विभाग के किसी युवा अधिकारी द्वारा वरिष्ठ जनों के संदेशों और फोन को लगातार नजरअंदाज किया जाना यदि सही है, तो यह निश्चित रूप से विभागीय कार्यसंस्कृति और प्रशासनिक शिष्टाचार पर गंभीर सवाल खड़े करता है।चर्चा यह भी है कि आखिर वह युवा आईएफएस अधिकारी कौन हैं, जिन्हें वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों और सम्मानित नागरिकों के संदेशों का जवाब देना अथवा उनका फोन उठाना जरूरी नहीं लगता? विभाग के भीतर इस अधिकारी को लेकर चर्चाएं होने की बात सामने आ रही है, लेकिन फिलहाल नाम सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है।सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या पद बढ़ने के साथ संवाद की जिम्मेदारी भी बढ़ती है या फिर पद की ताकत अधिकारी को इतना आत्मविश्वासी बना देती है कि वह वरिष्ठों तक को जवाब देना जरूरी नहीं समझता?फिलहाल इस अधिकारी का नाम हमारे पास स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए बिना पुष्टि के किसी अधिकारी का नाम लेना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर संबंधित अधिकारी की पहचान और उनके व्यवहार की पुष्टि होती है, तो ‘सर्वव्यापी’ जल्द ही पूरे मामले का तथ्यात्मक खुलासा करेगा। क्योंकि प्रशासन में पद बड़ा हो सकता है, अधिकार बड़े हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद और सम्मान से बड़ा कोई पद नहीं होता।

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