
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
विजयादशमी का पर्व आते ही देशभर में रावण के विशाल पुतले तैयार किए जाते हैं। मैदान सजते हैं, आतिशबाजी होती है, हजारों की भीड़ जुटती है और जय श्रीराम के उद्घोष के बीच रावण का दहन किया जाता है। हर वर्ष यही परंपरा दोहराई जाती है। संदेश दिया जाता है कि बुराई पर अच्छाई की जीत हुई, अधर्म पर धर्म की विजय हुई और अहंकार का अंत हुआ। लेकिन इन तमाम आयोजनों के बीच समाज के सामने एक सवाल खड़ा होना चाहिए—क्या रावण का पुतला जलाने मात्र से हमारे घरों के बेटे राम बन गए हैं? क्या रावण दहन के साथ समाज की बुराइयों का भी अंत हो गया है?यदि इसका उत्तर तलाशने का ईमानदार प्रयास किया जाए, तो तस्वीर इतनी सुखद दिखाई नहीं देती। मैदान में रावण का पुतला तो हर साल जलता है, लेकिन समाज में व्याप्त अहंकार, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, छल, कपट, नारी के प्रति अपमानजनक दृष्टिकोण और कमजोरों के शोषण जैसी बुराइयां आज भी अनेक रूपों में मौजूद हैं। ऐसे में सवाल केवल रावण के पुतले के दहन का नहीं, बल्कि उस विचारधारा और उन बुराइयों का है, जिनका प्रतीक रावण को माना जाता है।पुतला रावण का जलता है, भीतर का रावण कब जलेगा?भगवान श्रीराम भारतीय संस्कृति में मर्यादा, सत्य, त्याग, कर्तव्य, करुणा और आदर्श जीवन के प्रतीक हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि शक्ति का उपयोग संरक्षण के लिए होना चाहिए, शोषण के लिए नहीं; रिश्तों में सम्मान होना चाहिए, स्वार्थ नहीं; और अधिकारों के साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी आवश्यक है।इसके विपरीत, रावण का चरित्र हमें बताता है कि ज्ञान, शक्ति और वैभव होने के बावजूद यदि व्यक्ति अहंकार तथा अनैतिक आचरण में डूब जाए, तो उसका पतन निश्चित है।लेकिन आज हमारी विडंबना देखिए! हम रावण के पुतले को जलाने के लिए हजारों रुपये खर्च करने को तैयार हैं, परंतु अपने भीतर मौजूद बुराइयों को समाप्त करने के लिए आत्ममंथन करने को तैयार नहीं हैं। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे भगवान श्रीराम जैसे आदर्श बनें, लेकिन क्या हम स्वयं उनके सामने सत्य, ईमानदारी, अनुशासन और मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं?बच्चे उपदेशों से कम और अपने माता-पिता के आचरण से अधिक सीखते हैं। यदि घर में झूठ बोला जाता है, दूसरों का अपमान किया जाता है, महिलाओं के प्रति सम्मान का अभाव है और स्वार्थ के लिए नैतिकता को ताक पर रख दिया जाता है, तो केवल धार्मिक आयोजन करने से बच्चों में राम के आदर्श कैसे विकसित होंगे?राम बनने की शिक्षा मंचों से दिए गए भाषणों में नहीं, बल्कि परिवार में निभाई गई जिम्मेदारियों और जीवन में अपनाए गए संस्कारों में छिपी होती है।बेटियों के सम्मान की कसौटी पर समाजविजयादशमी का पर्व हमें विशेष रूप से नारी के सम्मान और सुरक्षा के विषय में सोचने के लिए प्रेरित करता है। भगवान श्रीराम के आदर्शों की चर्चा करने वाले समाज को यह भी देखना होगा कि उसकी बेटियां कितनी सुरक्षित हैं और महिलाओं को कितना सम्मान मिल रहा है।एक ओर हम माता दुर्गा की आराधना करते हैं, कन्याओं के चरण स्पर्श करते हैं और नारी शक्ति के जयकारे लगाते हैं। दूसरी ओर महिलाओं के प्रति अपमानजनक व्यवहार, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, छेड़छाड़ और यौन अपराध जैसी समस्याएं समाज के सामने चुनौती बनी हुई हैं।यह विरोधाभास हमें अपने आचरण पर विचार करने के लिए विवश करता है। जिस समाज में देवी की पूजा होती है, वहां प्रत्येक महिला के सम्मान और सुरक्षा को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए।बेटियों की सुरक्षा केवल कानून और पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। यह परिवार, समाज, शिक्षा व्यवस्था और प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व भी है। इसी तरह बेटों को बचपन से यह सिखाना आवश्यक है कि किसी महिला की इच्छा, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करना कमजोरी नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार और सच्चे चरित्र की पहचान है।यदि हम अपने बेटों को महिलाओं का सम्मान करना नहीं सिखा पाए, तो रावण दहन के भव्य आयोजन भी हमारी सामाजिक जिम्मेदारी की पूर्ति नहीं कर सकते।समाज में राम के आदर्श कहां खो गए?आज के समय में रावण के दस सिरों की प्रतीकात्मक व्याख्या की जाए, तो वे केवल पौराणिक कथा तक सीमित नहीं रह जाते। उन्हें अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, अन्याय, छल, कपट, असंयम और अमर्यादा जैसी मानवीय कमजोरियों के रूप में भी देखा जा सकता है।इन बुराइयों से मुक्ति पाने का प्रयास प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं करना होगा।यदि कोई व्यक्ति पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने के बाद दूसरों को छोटा समझने लगे, तो उसे अपने अहंकार पर विचार करना चाहिए। यदि कोई अधिकारी अपने अधिकारों का उपयोग जनता की सेवा के बजाय निजी स्वार्थ के लिए करता है, तो उसे अपने कर्तव्य का स्मरण करना चाहिए। यदि कोई जनप्रतिनिधि जनता से किए गए वादों को भूलकर केवल सत्ता और स्वार्थ की चिंता करता है, तो उसे भी रामराज्य के आदर्शों पर आत्ममंथन करना चाहिए।यदि कोई व्यक्ति धर्म की बातें तो करता है, लेकिन अपने व्यवहार में दूसरों के प्रति घृणा, भेदभाव और अन्याय रखता है, तो उसे समझना होगा कि धर्म का वास्तविक महत्व केवल शब्दों में नहीं, बल्कि आचरण में है।यह बात किसी एक वर्ग, समुदाय या व्यक्ति पर लागू नहीं होती। यह हम सभी के लिए आत्मचिंतन का विषय है।राम का नाम लेना सरल है, लेकिन राम के आदर्शों पर चलना कठिन। रावण का पुतला जलाना एक परंपरा है, लेकिन अपने भीतर के अहंकार और बुराइयों को समाप्त करना वास्तविक साधना है।क्या हर पिता अपने बेटे को राम बनाना चाहता है?हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बेटा संस्कारी बने, परिवार का नाम रोशन करे, माता-पिता का सम्मान करे और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करे। लेकिन केवल इच्छा रखने से आदर्श संतान का निर्माण नहीं होता। इसके लिए परिवार में समय, संवाद, अनुशासन, प्रेम और नैतिक शिक्षा का वातावरण तैयार करना पड़ता है।बेटे को यह सिखाना होगा कि धन से बड़ा चरित्र है, पद से बड़ा कर्तव्य है, ताकत से बड़ा संयम है और किसी भी रिश्ते में अधिकार जताने से अधिक महत्वपूर्ण दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना है।उसे यह भी समझाना होगा कि किसी की मजबूरी का लाभ उठाना वीरता नहीं, बल्कि नैतिक कमजोरी है। किसी कमजोर व्यक्ति को दबाना शक्ति नहीं, बल्कि अन्याय है। अपने परिवार की महिलाओं का सम्मान करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि प्रत्येक महिला के प्रति सम्मानजनक व्यवहार करना आवश्यक है।बच्चों को यह संस्कार घर से ही मिलते हैं। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि हमारे बेटे राम क्यों नहीं बन रहे, बल्कि यह भी होना चाहिए कि हम उन्हें किस प्रकार का वातावरण और कौन-से संस्कार दे रहे हैं।रावण दहन के साथ संकल्प दहन भी होविजयादशमी का पर्व तभी सार्थक होगा, जब रावण के पुतले के साथ हम अपनी बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प भी लें।हर परिवार संकल्प ले कि घर में बेटा और बेटी के बीच भेदभाव नहीं किया जाएगा। बच्चों को झूठ, छल और अन्याय से दूर रहने की शिक्षा दी जाएगी। महिलाओं के सम्मान को परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाएगा। बुजुर्गों की उपेक्षा नहीं होगी और कमजोर व्यक्ति की मजबूरी का लाभ नहीं उठाया जाएगा।समाज संकल्प ले कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई जाएगी, भ्रष्टाचार को सामान्य व्यवहार मानकर स्वीकार नहीं किया जाएगा और किसी अपराध को केवल सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के लिए छिपाया नहीं जाएगा।धार्मिक और सामाजिक संस्थाएं भी अपने आयोजनों में नैतिक शिक्षा, महिला सम्मान, नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सद्भाव जैसे विषयों को स्थान दें। त्योहार केवल मनोरंजन और प्रदर्शन का माध्यम न बनें, बल्कि समाज को बेहतर बनाने की प्रेरणा भी दें।आखिरकार, भगवान श्रीराम का आदर्श केवल मंदिरों, मंचों और धार्मिक नारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वह हमारे व्यवहार, निर्णयों, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक जिम्मेदारियों में दिखाई देना चाहिए।निष्कर्ष: रावण हर साल जलता है, फिर बुराइयां क्यों जीवित हैं?यह सवाल किसी की धार्मिक आस्था पर चोट करने के लिए नहीं, बल्कि उस आस्था को जीवन के व्यवहार से जोड़ने के लिए है। रावण दहन हमारी सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है। लेकिन इस संदेश की सार्थकता तभी है, जब हम इसे अपने जीवन में भी उतारें।हमें यह समझना होगा कि रावण केवल एक पुतले का नाम नहीं, बल्कि उन बुराइयों का प्रतीक भी है, जो मनुष्य को अपने कर्तव्य, विवेक और मर्यादा से दूर ले जाती हैं। उसी तरह राम केवल एक नाम नहीं, बल्कि सत्य, त्याग, करुणा, न्याय और मर्यादित आचरण की प्रेरणा हैं।इसलिए अगली बार जब रावण का पुतला जले, तो हम केवल आतिशबाजी देखकर घर न लौटें। कुछ क्षण अपने भीतर झांकें और स्वयं से पूछें कि हमने अपने जीवन में कौन-सी बुराई समाप्त की है? क्या हमने किसी के साथ अन्याय करना छोड़ा है? क्या हमने अपने व्यवहार में बदलाव लाया है? क्या हम अपनी संतानों के सामने ऐसे आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं, जिनसे वे बेहतर इंसान बन सकें?क्योंकि समाज को केवल राम के जयकारे लगाने वालों की नहीं, बल्कि राम के आदर्शों पर चलने वालों की आवश्यकता है।याद रखिए, रावण का पुतला जलने से बुराई के अंत का संदेश मिलता है, लेकिन बुराई का वास्तविक अंत तब होता है, जब इंसान अपने भीतर के रावण को पहचानकर उसका त्याग करता है।और अंत में एक सवाल, जो प्रत्येक परिवार, प्रत्येक माता-पिता और प्रत्येक नागरिक को स्वयं से पूछना चाहिए—रावण दहन करने से क्या सबके बेटे राम बन गए हैं? यदि नहीं, तो क्यों न इस विजयादशमी पर हम केवल रावण का पुतला जलाने के बजाय अपने बच्चों में राम के संस्कार और अपने जीवन में राम के आदर्श स्थापित करने का संकल्प लें?




