
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में इन दिनों तबादलों का दौर लगातार जारी है। विभाग से स्थानांतरण आदेशों की लंबी-लंबी सूचियां जारी हो रही हैं, लेकिन इन आदेशों के पीछे चल रही अनुशंसा की व्यवस्था अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। चर्चा है कि मुख्यमंत्री स्वयं जिन स्थानांतरण प्रस्तावों पर टीप लिखकर अनुशंसा कर रहे हैं, उन्हें भी मुख्यमंत्री सचिवालय में अपेक्षित महत्व नहीं मिल रहा है। वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष के विधायकों और सांसदों द्वारा अपने क्षेत्र के शिक्षकों एवं कर्मचारियों के स्थानांतरण के लिए भेजी गई अनुशंसाएं कथित तौर पर फाइलों में ही दबी रह जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब मुख्यमंत्री की लिखित अनुशंसा का ही सम्मान नहीं हो रहा है तो फिर सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधियों की सिफारिशों का क्या औचित्य रह गया है? इस पूरी स्थिति का राजनीतिक और प्रशासनिक खामियाजा स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव को भुगतना पड़ रहा है। विभाग में जारी स्थानांतरण आदेशों को लेकर यह भी चर्चा है कि अब तक जारी कई सूचियों में मुख्यमंत्री निवास से प्राप्त अनुशंसाओं को प्राथमिकता दी गई है, जबकि विधायकों और सांसदों की सिफारिशों को दरकिनार किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। यदि यह स्थिति सही है तो यह केवल जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का मामला नहीं, बल्कि शासन की स्थानांतरण नीति, पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल है। आखिर स्कूल शिक्षा विभाग में स्थानांतरण का वास्तविक आधार क्या है? क्या निर्णय प्रशासनिक आवश्यकता और नियमों के अनुसार हो रहे हैं या फिर अनुशंसाओं के प्रभाव और पहुंच के आधार पर? मुख्यमंत्री सचिवालय, स्कूल शिक्षा विभाग और मंत्री गजेन्द्र यादव को इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि तबादलों की राजनीति में यदि जनप्रतिनिधियों की सिफारिशें बेअसर और चुनिंदा अनुशंसाएं प्रभावी दिखाई देंगी तो सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।




