तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में सूचना के अधिकार कानून के जरिए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला राज्य सूचना आयोग के आदेश के अनुपालन से जुड़ा है, जहां शिकायतकर्ता का दावा है कि आयोग के स्पष्ट निर्देश के बावजूद संबंधित अधिकारी की ओर से अब तक आवश्यक शपथ-पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया। चार अलग-अलग शिकायत प्रकरणों में 50-50 रुपये के स्टाम्प पेपर पर शपथ-पत्र प्रस्तुत किए जाने का निर्देश होने के बावजूद, शिकायतकर्ता के अनुसार महीनों बीत जाने के बाद भी आदेश का पूर्ण अनुपालन नहीं हुआ है।दस्तावेजों में यह मामला सी/6335/2023/रायपुर, सी/6336/2023/रायपुर, सी/6337/2023/रायपुर और सी/6338/2023/रायपुर से संबंधित बताया गया है। इन प्रकरणों में तत्कालीन वनमंडलाधिकारी, बालोद आयुष जैन से अलग-अलग 50 रुपये के स्टाम्प पेपर पर शपथ-पत्र प्रस्तुत करने का विषय सामने आया है। शिकायतकर्ता अनिल कुमार अग्रवाल का कहना है कि आयोग के आदेश के बावजूद निर्धारित कार्रवाई नहीं हुई और इस संबंध में उन्हें लगातार पत्राचार करना पड़ा।सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दस्तावेजों के अनुसार 24 सितंबर 2025 को तत्कालीन सूचना आयुक्त आलोक चन्द्रवंशी द्वारा संबंधित जानकारी शपथ-पत्र के माध्यम से प्रस्तुत किए जाने का आदेश दिया गया था। इसके बाद शिकायतकर्ता की ओर से 21 दिसंबर 2025 से 1 मई 2026 तक सात पत्र भेजे जाने का उल्लेख है। बावजूद इसके, शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत पत्र में दावा किया गया कि 30 मई 2026 तक संबंधित शपथ-पत्र प्राप्त नहीं हुआ था।यहीं से पूरे मामले की गंभीरता बढ़ जाती है। यदि 24 सितंबर 2025 को आयोग का आदेश जारी हुआ था तो उसके अनुपालन में मई 2026 तक स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं हुई? क्या संबंधित अधिकारी को आदेश की जानकारी नहीं थी? यदि जानकारी थी तो अनुपालन में देरी का कारण क्या था? और यदि किसी स्तर पर आदेश के पालन में बाधा उत्पन्न हुई तो उसकी जिम्मेदारी अब तक तय क्यों नहीं की गई?चार प्रकरण, चार शपथ-पत्र और महीनों का इंतजारमामला केवल एक शपथ-पत्र का नहीं बताया जा रहा है। चार अलग-अलग शिकायत प्रकरणों में अलग-अलग 50 रुपये के शपथ-पत्र प्रस्तुत किए जाने की बात सामने आई है। यानी कुल चार शपथ-पत्र, जिनकी कुल स्टाम्प राशि महज 200 रुपये है। सवाल यह है कि जिस कार्रवाई की आर्थिक लागत इतनी मामूली है, उसके अनुपालन में इतना लंबा समय आखिर क्यों लगा?यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला सामान्य विभागीय पत्राचार का नहीं, बल्कि राज्य सूचना आयोग के आदेश का है। आयोग का आदेश यदि निर्धारित समय में लागू नहीं होता है तो इससे न केवल संबंधित शिकायतकर्ता की सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि सूचना आयोग की आदेशात्मक व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठता है।सात पत्राचार के बाद भी स्थिति साफ नहीं—कौन है जिम्मेदार?शिकायतकर्ता के दस्तावेजों में लगातार पत्राचार का उल्लेख है। दिसंबर 2025 से मई 2026 तक कई बार संबंधित कार्यालयों और अधिकारियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट किए जाने के बावजूद यदि शपथ-पत्र उपलब्ध नहीं हुआ, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि इन पत्रों पर क्या कार्रवाई हुई?क्या पत्र संबंधित अधिकारी तक पहुंचे?क्या कार्यालय ने कोई जवाब जारी किया?क्या आयोग को अनुपालन रिपोर्ट भेजी गई?यदि नहीं भेजी गई तो क्यों?और यदि भेजी गई तो उसकी प्रति शिकायतकर्ता को क्यों नहीं मिली?इन सवालों का जवाब सामने आना इसलिए जरूरी है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि देरी महज प्रशासनिक लापरवाही थी या इसके पीछे कोई अन्य कारण था।‘किसके संरक्षण में टल रही कार्रवाई?’—शिकायतकर्ता का गंभीर सवालशिकायतकर्ता ने मामले को लेकर सरकार और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों से संज्ञान लेने की मांग की है। पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, वन मंत्री केदार कश्यप तथा नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत से मामले की जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग उठाई गई है।हालांकि, किसी अधिकारी के संबंध में संरक्षण या मिलीभगत जैसे आरोपों को प्रमाणित तथ्य मानने के बजाय उनकी स्वतंत्र जांच जरूरी है। लेकिन शिकायतकर्ता द्वारा लगातार पत्राचार किए जाने और आयोग के आदेश के अनुपालन में देरी के दावे की स्थिति में प्रशासन के सामने यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि आखिर इतने लंबे समय तक मामला लंबित क्यों रहा।आरटीआई की धार कुंद हुई तो जवाबदेही किसकी?सूचना का अधिकार कानून नागरिकों को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही का अधिकार देता है। इसी व्यवस्था के तहत राज्य सूचना आयोग को शिकायतों की सुनवाई और आवश्यक निर्देश जारी करने का अधिकार प्राप्त है। ऐसे में यदि आयोग के आदेश के बाद भी अनुपालन में लंबा विलंब होता है तो इसका असर केवल एक शिकायतकर्ता तक सीमित नहीं रहता।यह सवाल व्यापक हो जाता है कि यदि सरकारी अधिकारी ही सूचना आयोग के आदेश के अनुपालन में देरी करें तो आम नागरिक अपनी सूचना के अधिकार की रक्षा के लिए आखिर किस दरवाजे पर दस्तक दे?आम नागरिक से अपेक्षा की जाती है कि वह निर्धारित समयसीमा, निर्धारित प्रक्रिया और नियमों का पालन करे। फिर सरकारी तंत्र के किसी अधिकारी के स्तर पर आयोग के आदेश के अनुपालन में देरी होने पर समान रूप से जवाबदेही क्यों नहीं तय होनी चाहिए?अब निगाहें आयोग और वन विभाग परइस पूरे प्रकरण में अब सबसे अहम भूमिका छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग और संबंधित वन विभागीय अधिकारियों की है। यदि आदेश का अनुपालन हो चुका है तो इसकी आधिकारिक स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। यदि अब तक अनुपालन नहीं हुआ है तो देरी का कारण और जिम्मेदार अधिकारी स्पष्ट किया जाना चाहिए।साथ ही यह भी सामने आना चाहिए कि 24 सितंबर 2025 के आदेश से लेकर 30 मई 2026 तक इस मामले में किस-किस स्तर पर क्या कार्रवाई हुई। सात बार पत्राचार के बावजूद यदि स्थिति नहीं बदली तो उन पत्रों पर कार्रवाई करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।सीधा सवाल, जवाब कौन देगा?24 सितंबर 2025 के आदेश के बाद 30 मई 2026 तक चार शपथ-पत्र क्यों नहीं मिले?सात बार पत्राचार के बावजूद अनुपालन की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं हुई?क्या संबंधित अधिकारी से आयोग ने अनुपालन रिपोर्ट मांगी?यदि आदेश का पालन नहीं हुआ तो जिम्मेदारी किसकी तय की गई?क्या देरी के लिए किसी अधिकारी पर कार्रवाई प्रस्तावित हुई?और सबसे बड़ा सवाल—क्या सूचना आयोग के आदेशों का पालन कराने के लिए भी शिकायतकर्ता को महीनों तक पत्र लिखते रहना पड़ेगा?चार प्रकरण, चार शपथ-पत्र, महज 200 रुपये के स्टाम्प और महीनों का इंतजार—यह मामला अब सिर्फ एक शिकायतकर्ता और एक अधिकारी के बीच का विवाद नहीं रह गया है। यह सूचना के अधिकार की प्रभावशीलता और सरकारी जवाबदेही से जुड़ा सवाल बन चुका है।यदि दस्तावेजों में दर्ज तथ्य सही हैं और आयोग के आदेश का निर्धारित समय में अनुपालन नहीं हुआ है, तो अब केवल पत्राचार नहीं, बल्कि जवाबदेही और कार्रवाई की जरूरत है। जनता यह जानना चाहती है कि आदेश लागू हुआ या नहीं—और अगर नहीं हुआ तो आखिर किसकी जिम्मेदारी तय होगी?




