तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के युवा आईएएस अधिकारी जगदीश सोनकर को लेकर इन दिनों तरह-तरह के आरोप और चर्चाएं सामने आ रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी स्तर पर आर्थिक अनियमितता, प्रशासनिक गड़बड़ी या नियमों के उल्लंघन की शिकायत है, तो उसे सार्वजनिक आरोपों और चर्चाओं तक सीमित रखने के बजाय ठोस दस्तावेज और साक्ष्यों के साथ सक्षम जांच एजेंसी अथवा शासन के समक्ष क्यों नहीं रखा जाता?
जगदीश सोनकर 2013 बैच के छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। उनके प्रशासनिक कार्यकाल में अलग-अलग जिम्मेदारियां रही हैं और वे खैरागढ़-छुईखदान-गंडई के पहले कलेक्टर के रूप में भी कार्य कर चुके हैं।उनके खिलाफ यदि कोई गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं तो लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था में उसका सबसे उचित रास्ता यही है कि शिकायतकर्ता आरोप की तारीख, स्थान, संबंधित आदेश, भुगतान अथवा वित्तीय अभिलेख और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के साथ लिखित शिकायत करे। जांच के बाद ही यह तय हो सकता है कि आरोप में तथ्य है या नहीं।
गौरतलब है कि जगदीश सोनकर को लेकर अतीत में भी सोशल मीडिया पर सामग्री और तस्वीरें प्रसारित हुई हैं। वर्ष 2022 में उनकी एक पुरानी तस्वीर को नए संदर्भ में प्रसारित किए जाने पर तथ्य-जांच में इसे भ्रामक संदर्भ वाला मामला बताया गया था। तस्वीर वास्तव में वर्ष 2016 की घटना से संबंधित थी। यह उदाहरण बताता है कि किसी अधिकारी के संबंध में सामग्री सामने आने पर उसके समय, संदर्भ और मूल स्रोत की पुष्टि करना कितना आवश्यक है।
शिकायत हो तो जांच से पीछे क्यों हटना?
यदि किसी व्यक्ति, संस्था या अधिकारी के पास जगदीश सोनकर के कार्यकाल से जुड़ी कथित घपलेबाजी के प्रमाण हैं, तो वे उन्हें शासन के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके विपरीत यदि आरोप केवल सोशल मीडिया, राजनीतिक चर्चाओं या अनाम दावों तक सीमित हैं और उनके साथ कोई दस्तावेजी आधार नहीं है, तो ऐसे आरोपों की विश्वसनीयता पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे।यही सिद्धांत केवल एक अधिकारी पर नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र पर लागू होना चाहिए। आईएएस, आईपीएस अथवा राज्य प्रशासनिक सेवा के किसी अधिकारी के खिलाफ शिकायत मिलती है तो शासन को शिकायत की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच की व्यवस्था करनी चाहिए। दोष सामने आए तो नियमानुसार कार्रवाई हो और आरोप निराधार साबित हों तो अधिकारी की प्रतिष्ठा पर लगे सवालों का भी समाधान होना चाहिए।
मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री सचिवालय की भूमिका अहम
ऐसे मामलों में शासन के स्तर पर पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव विकास शील और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं।ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के विरुद्ध गंभीर शिकायत आती है तो उसे न तो राजनीतिक दबाव के कारण दबाया जाए और न ही बिना जांच के सार्वजनिक आरोपों को सच मान लिया जाए। शिकायत की जांच, दस्तावेजों का परीक्षण और तथ्य सामने आने के बाद निर्णय—यही प्रशासनिक निष्पक्षता का रास्ता है।
बदनाम करने वालों से भी सवाल, शासन से भी जवाबदेही
किसी अधिकारी के खिलाफ आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोप को प्रमाणित करना उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि वास्तव में कोई वित्तीय या प्रशासनिक घपला हुआ है तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक जांच के सामने आने चाहिए। और यदि आरोप तथ्यहीन हैं तो किसी अधिकारी की छवि खराब करने के प्रयासों पर भी शासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
मुद्दा किसी एक अधिकारी के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों की जांच आरोपों की आवाज देखकर होगी या दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर?शासन यदि इस कसौटी को स्पष्ट और समान रूप से लागू करता है तो इससे न केवल अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित होगी, बल्कि बेबुनियाद आरोपों से प्रशासनिक अधिकारियों की प्रतिष्ठा की रक्षा भी होगी। आखिरकार लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोप से बड़ा प्रमाण और चर्चा से बड़ी निष्पक्ष जांच होती है।




