
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
लोकतंत्र में चुनाव केवल मतदान की तारीख का नाम नहीं है। चुनाव की विश्वसनीयता उस पूरी प्रक्रिया से तय होती है, जिसके जरिए मतदाता सूची तैयार होती है, नाम जुड़ते और हटते हैं, दावे-आपत्तियां सुनी जाती हैं और अंततः जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है। इसलिए जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सवाल उठते हैं और उसी बीच निर्वाचन आयोग के भीतर कथित असहमति की खबरें सामने आती हैं, तो इसे महज राजनीतिक बयानबाजी कहकर टाल देना पर्याप्त नहीं हो सकता।25 सितंबर को कांग्रेस ने देशभर में प्रदर्शन कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने, उनके कार्यकाल में लिए गए निर्णयों की स्वतंत्र समीक्षा तथा मतदाता सूची में हुए बदलावों की जांच की मांग की। कांग्रेस ने यह आंदोलन SIR को लेकर उठे विवाद और निर्वाचन आयोग के दो अन्य आयुक्तों द्वारा कथित तौर पर दर्ज कराई गई आपत्तियों की मीडिया रिपोर्ट के बाद किया है।यहीं से चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—आखिर वह इन आरोपों और कथित असहमतियों पर खुलकर स्पष्टीकरण क्यों नहीं देता?मीडिया रिपोर्टों के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब दस महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ फैसले या आदेश उनकी जानकारी के बिना लिए या जारी किए जाने को लेकर आपत्ति दर्ज हुई। ये बातें फिलहाल मीडिया रिपोर्ट में सामने आई हैं और इनके अंतिम निष्कर्ष के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड और निर्वाचन आयोग का स्पष्ट पक्ष महत्वपूर्ण है।लेकिन सवाल फिर भी अपनी जगह कायम है।यदि आयोग के भीतर सब कुछ सामान्य था, तो स्थिति स्पष्ट करने में संकोच कैसा? और यदि असहमति दर्ज हुई थी, तो उसकी प्रकृति और कारण जनता के सामने क्यों नहीं रखे जाने चाहिए?चुनाव आयोग कोई सामान्य सरकारी विभाग नहीं है। उसकी विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। राजनीतिक दल आज हैं, कल कोई और होगा; सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन निर्वाचन संस्था पर जनता का भरोसा बना रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है।यही कारण है कि SIR को लेकर उठ रहे सवालों को केवल कांग्रेस बनाम चुनाव आयोग के संघर्ष के रूप में देखना इस पूरे विवाद को छोटा कर देना होगा।कांग्रेस का आरोप है कि SIR के जरिए मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव का खतरा पैदा हुआ है। दूसरी ओर निर्वाचन प्रक्रिया में पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना बताया जाता है। ऐसे में असली जरूरत आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि पारदर्शी आंकड़ों, स्पष्ट प्रक्रिया और सार्वजनिक जवाबदेही की है।अगर किसी मतदाता का नाम हटता है तो उसे यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि नाम क्यों हटाया गया। अगर किसी मतदाता को नोटिस दिया जाता है तो सत्यापन की प्रक्रिया क्या है, इसकी जानकारी स्पष्ट होनी चाहिए। अगर किसी नाम को लेकर दावा या आपत्ति आती है तो उसका निपटारा किस आधार पर हुआ, यह भी पारदर्शी होना चाहिए।मतदाता सूची में एक नाम की गलती भी केवल कागज की गलती नहीं होती—वह किसी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ी होती है।इसीलिए चुनाव आयोग को आलोचना से असहज होने के बजाय आलोचना का जवाब दस्तावेजों से देना चाहिए।कांग्रेस का प्रदर्शन राजनीतिक है और उसकी मांगों को उसी राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। लेकिन किसी राजनीतिक दल के सवाल उठाने मात्र से सवाल खत्म नहीं हो जाते। उनका उत्तर देना या उन्हें तथ्यों के आधार पर खारिज करना निर्वाचन आयोग की संस्थागत जिम्मेदारी का हिस्सा है।राहुल गांधी और कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं। इन आरोपों को तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन इन्हें केवल राजनीतिक शोर बताकर खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक संवाद का समाधान नहीं है। आरोप का जवाब आरोप से नहीं, प्रमाण से होना चाहिए।आज जरूरत इस बात की है कि निर्वाचन आयोग सामने आए और साफ-साफ बताए—SIR के तहत मतदाता सूची में कितने नाम जोड़े गए और कितने हटाए गए?नाम हटाने के प्रमुख आधार क्या रहे?कितने मतदाताओं को नोटिस दिए गए?कितने दावे और आपत्तियां प्राप्त हुईं?कितने नाम पुनः जोड़े गए?निर्वाचन आयोग के भीतर दर्ज कथित असहमतियों की वास्तविक स्थिति क्या है?और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इन फैसलों से संबंधित पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है?यही वह बिंदु है जहां चुनाव आयोग को राजनीतिक संस्था नहीं, संवैधानिक संस्था के रूप में अपनी जवाबदेही साबित करनी होगी।कांग्रेस सड़कों पर है। विपक्ष सवाल उठा रहा है। राजनीतिक तापमान बढ़ रहा है। लेकिन लोकतंत्र का तापमान केवल नारों से नहीं, संस्थाओं की पारदर्शिता से नियंत्रित होता है।आज मुद्दा सिर्फ “ज्ञानेश कुमार हटें या नहीं” का नहीं है। उससे बड़ा सवाल है—क्या देश का मतदाता अपने वोट और अपनी मतदाता सूची को लेकर पूरी तरह आश्वस्त रह सकता है?इस सवाल का जवाब किसी राजनीतिक दल को नहीं, निर्वाचन आयोग को देना है।और जवाब ऐसा होना चाहिए जिसे जनता केवल सुन न सके, बल्कि दस्तावेजों में देख भी सके।क्योंकि चुनाव आयोग से सवाल करना लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है।लोकतंत्र की असली मजबूती तब दिखाई देती है, जब उसकी सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं से भी सवाल पूछे जा सकें—और उन सवालों का जवाब पारदर्शिता, तथ्यों और संविधान की कसौटी पर दिया जाए।




