तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

हमारे अखबार और वेबपोर्टल सर्वव्यापी में प्रकाशित खबरों को लेकर इन दिनों प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर है। कुछ अफसरों और मंत्रियों की ओर से यह कहा जा रहा है कि सर्वव्यापी सरकार के खिलाफ समाचार प्रकाशित करता है। सवाल यह है कि यदि किसी समाचार में सरकारी व्यवस्था की कमियां, योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियां, भ्रष्टाचार के आरोप, कथित अनियमितताएं या आम जनता से जुड़े सवाल सामने रखे जाते हैं, तो उसे सरकार के खिलाफ खबर क्यों माना जाए?पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि जनता से जुड़े सवालों को सामने लाना और व्यवस्था से जवाब मांगना भी है। सरकार की कोई योजना जमीन पर ठीक से लागू नहीं हो रही है, किसी विभाग में लापरवाही सामने आ रही है, कहीं भ्रष्टाचार या अनियमितता के आरोप लग रहे हैं अथवा किसी सरकारी व्यवस्था से आम नागरिक परेशान हैं, तो उन मुद्दों को समाचार के माध्यम से सामने रखना ही पत्रकारिता की जिम्मेदारी है। यदि खबर में सामने आई कमियों के बाद सरकार या संबंधित विभाग कार्रवाई करता है और व्यवस्था में सुधार आता है, तो यह सरकार का विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की रचनात्मक भूमिका है।सर्वव्यापी का सवाल भी सीधा है—यदि सरकार की कमियां दिखाई जाएं तो क्या वह सरकार के खिलाफ होना है? यदि किसी सड़क की हालत खराब है और उसकी तस्वीर सामने रखी जाती है, यदि किसी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंच रहा और उसकी वास्तविकता बताई जाती है, यदि किसी विभाग में अनियमितता के आरोप सामने आते हैं और संबंधित पक्ष से जवाब मांगा जाता है, तो इसे विरोध का नाम देना पत्रकारिता की भूमिका को सीमित करने जैसा होगा।सरकार के अच्छे कामों को समाचार में स्थान देना भी मीडिया की जिम्मेदारी है और कमियों को सामने लाना भी। लोकतंत्र में सत्ता और मीडिया का रिश्ता केवल प्रशंसा तक सीमित नहीं हो सकता। सवाल पूछना, जवाब मांगना और जनता की आवाज को शासन तक पहुंचाना भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है। सरकार की योजनाओं की सफलता सामने आए तो उसका उल्लेख होना चाहिए, लेकिन उन्हीं योजनाओं की जमीनी हकीकत में यदि विसंगतियां दिखाई दें तो उन्हें भी सामने आना चाहिए।सर्वव्यापी में प्रकाशित खबरों को लेकर यदि किसी मंत्री, अधिकारी या विभाग को किसी तथ्य पर आपत्ति है तो उसके पास अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। किसी खबर में तथ्यात्मक त्रुटि हो तो उसका खंडन किया जा सकता है, दस्तावेजों के साथ वास्तविक स्थिति बताई जा सकती है और पत्रकारिता का यही स्वस्थ संवाद है। लेकिन केवल इसलिए किसी समाचार को सरकार विरोधी कहना कि उसमें सरकार या प्रशासन की किसी कमी को उजागर किया गया है, अपने आप में विचार का विषय जरूर है।आखिर आईना वही दिखाता है जो सामने होता है। आईने में चेहरा जैसा दिखाई देता है, वैसा ही नजर आता है। खबर भी व्यवस्था का आईना है—अच्छा काम होगा तो वह सामने आएगा, कमी होगी तो वह भी दिखाई देगी। भ्रष्टाचार होगा तो सवाल उठेंगे, घोटाले के आरोप होंगे तो पड़ताल होगी, योजना बदहाल होगी तो उसकी जमीनी तस्वीर सामने रखी जाएगी और जनता परेशान होगी तो उसकी आवाज उठाई जाएगी।सर्वव्यापी का प्रयास किसी व्यक्ति, मंत्री, अधिकारी या सरकार के खिलाफ अभियान चलाना नहीं, बल्कि जनहित के मुद्दों को प्रमुखता देना और शासन-प्रशासन को उसकी जिम्मेदारियों का आईना दिखाना है। सत्ता किसी भी दल की हो, सरकार किसी भी विचारधारा की हो और अधिकारी किसी भी पद पर हों—जनता से जुड़े सवालों पर पत्रकारिता की नजर बनी रहनी चाहिए।इसलिए सवाल फिर वही है—सरकार की कमियां बताना सरकार का विरोध कैसे हो गया? यदि किसी खबर के कारण किसी व्यवस्था में सुधार होता है, किसी अधिकारी को अपनी जिम्मेदारी का एहसास होता है, किसी योजना की खामी दूर होती है या किसी आम नागरिक की समस्या शासन तक पहुंचती है, तो उस खबर का उद्देश्य पूरा होता है।लोकतंत्र में मजबूत सरकार के लिए मजबूत विपक्ष जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाला मीडिया भी है। खबर से असहमति हो सकती है, खबर के तथ्य पर सवाल उठाया जा सकता है, लेकिन हर सवाल को विरोध की संज्ञा देना शायद उस संवाद की गुंजाइश को ही कम कर देता है, जिसकी लोकतंत्र को सबसे ज्यादा जरूरत है।




