
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में टीईटी, शिक्षकों की पदोन्नति और तबादलों को लेकर लगातार बढ़ते विवाद के बीच अब सेवानिवृत्त शिक्षक भी शिक्षकों के समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं। सेवानिवृत्त शिक्षक रंजीत बनर्जी ने कहा है कि स्कूल शिक्षा मंत्री तक विभाग की जमीनी हकीकत और सही जानकारी पूरी तरह नहीं पहुंच रही है। उनके अनुसार कुछ लोग मंत्री को मिसगाइड कर नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं। सवाल यह है कि पिछले दरवाजे से तबादलों, वरिष्ठ अधिकारियों के रहते कनिष्ठ अधिकारियों की पदस्थापना, टीईटी विवाद और शिक्षकों की पदोन्नति जैसे मामलों में आखिर वास्तविक स्थिति मंत्री तक क्यों नहीं पहुंच रही है—या फिर मंत्री जानकर भी अनजान बने हुए हैं?रंजीत बनर्जी ने कहा कि वर्तमान में टीईटी का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील और गरम विषय बना हुआ है। सेवारत शिक्षकों के लिए विभागीय टीईटी की मांग लगातार उठ रही है। ऐसे समय में पदोन्नति की प्रक्रिया को इतनी जल्दबाजी में आगे बढ़ाने की आवश्यकता क्यों है? यदि विभागीय टीईटी आयोजित होने के बाद भी पदोन्नति की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है तो अभी ऐसी कौन-सी अनिवार्यता है कि पूरी प्रक्रिया को जल्दबाजी में निपटाने की कोशिश की जा रही है?उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था अभी पूरी तरह ठप नहीं है, बल्कि शिक्षक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं। ऐसे में विभाग को जल्दबाजी के बजाय ऐसा व्यावहारिक और न्यायसंगत रास्ता निकालना चाहिए, जिसमें वर्षों से सेवा दे रहे वरिष्ठ शिक्षकों के हित सुरक्षित रहें और टीईटी विवाद का भी स्थायी समाधान निकल सके।रंजीत बनर्जी ने कहा कि पदोन्नति में टीईटी को एकमात्र आधार बनाकर पुराने और वरिष्ठ शिक्षकों को बाहर कर देना महज तकनीकी निर्णय नहीं है। यह शिक्षकों के सम्मान, अनुभव, सेवा और मानवीय गरिमा से जुड़ा गंभीर विषय है। दशकों तक स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने और शिक्षा व्यवस्था को संभालने वाले शिक्षकों को अचानक किसी एक पात्रता परीक्षा के आधार पर अपात्र मान लेना उनके लंबे अनुभव और सेवाकाल की अनदेखी होगी।उनके मुताबिक, शिक्षक की योग्यता को केवल डिग्री, प्रमाणपत्र अथवा पात्रता परीक्षा के अंकों तक सीमित नहीं किया जा सकता। यदि सरकार और विभाग सेवारत शिक्षकों के लिए विभागीय टीईटी की व्यवस्था करते हैं तो हजारों शिक्षकों को अपनी पात्रता साबित करने का अवसर मिलेगा। इसके बाद पदोन्नति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है। इससे लंबे समय से चल रहे टीईटी विवाद को भी एक व्यावहारिक और सम्मानजनक समाधान मिल सकता है।तीन साल के तबादलों पर भी उठे सवालसेवानिवृत्त शिक्षकों ने बीते करीब तीन वर्षों में हुए शिक्षकों के तबादलों पर भी गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। रंजीत बनर्जी ने कहा कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी से लेकर डॉ. रमन सिंह के पंद्रह वर्ष के शासनकाल और भूपेश बघेल की पांच वर्षीय सरकार तक प्रशासन और स्कूल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को करीब से देखा है। अलग-अलग सरकारों के दौरान शिक्षक संगठनों के साथ मतभेद और आंदोलन जरूर हुए, लेकिन संवाद के रास्ते हमेशा खुले रहे।मौजूदा स्थिति पर उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर तबादला नीति में शिक्षकों के स्थानांतरण पर रोक अथवा सीमित व्यवस्था की बात कही जाती है, वहीं दूसरी ओर धड़ाधड़ तबादले किए जाने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। इससे शिक्षकों के बीच असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।उन्होंने कहा कि आज हालात ऐसे बनते दिखाई दे रहे हैं कि शिक्षक अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए मुख्यमंत्री के निवास क्षेत्र और स्कूल शिक्षा मंत्री के गृह क्षेत्र तक जाने तथा आंदोलन या घेराव की तैयारी कर रहे हैं। आखिर ऐसी परिस्थितियां क्यों निर्मित हो रही हैं? जब शिक्षक अपनी समस्याएं सरकार तक पहुंचाने के लिए इस स्तर तक जाने को मजबूर हों तो विभाग और सरकार दोनों को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर संवाद और संवेदनशीलता की व्यवस्था में कमी कहां रह गई है।“ट्रांसफर का बैक फायर, सरकार की साख पर फ्रंट फायर”रंजीत बनर्जी ने स्कूल शिक्षा मंत्री से आग्रह किया कि वे केवल विभागीय अधिकारियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर निर्णय न लें, बल्कि शिक्षकों, शिक्षक संगठनों और जमीनी स्तर की वास्तविक परिस्थितियों को भी समझें। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि पिछले दरवाजे से ट्रांसफर का बैक फायर सरकार की साख पर फ्रंट फायर साबित हो सकता है।उन्होंने कहा कि विभागीय अधिकारी शिक्षकों को बच्चा समझने की भूल न करें। आज भी हजारों ऐसे शिक्षक हैं जिन्होंने स्कूल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को 20 से 25 वर्षों तक करीब से देखा और समझा है। वे विभाग की रीति-नीति, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और जमीनी वास्तविकताओं से भली-भांति परिचित हैं। ऐसे अनुभवी शिक्षकों की बात को नजरअंदाज करने के बजाय उनकी सेवा, अनुभव और सुझावों को नीतिगत निर्णयों का आधार बनाया जाना चाहिए।सेवानिवृत्त शिक्षक रंजीत बनर्जी ने कहा कि सरकार यदि वास्तव में “सबका साथ, सबका विकास” की भावना पर काम कर रही है तो स्कूल शिक्षा विभाग में भी निर्णयों का आधार यही होना चाहिए। टीईटी, पदोन्नति और तबादले जैसे मुद्दों पर टकराव के बजाय संवाद, जल्दबाजी के बजाय न्यायसंगत प्रक्रिया और केवल फाइलों की जानकारी के बजाय जमीनी सच्चाई के आधार पर निर्णय लिए जाने चाहिए।रंजीत बनर्जी का कहना है कि अभी भी समय है कि स्कूल शिक्षा मंत्री स्वयं सामने आकर शिक्षकों, संगठनों और सेवानिवृत्त शिक्षकों से संवाद करें। अन्यथा टीईटी, पदोन्नति और तबादले के अलग-अलग विवाद मिलकर शिक्षा विभाग के लिए बड़ा संकट और सरकार की साख के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं।



