
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
राजनीति केवल चुनाव जीतने और पद हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि जनता द्वारा दिए गए विश्वास को परिणाम में बदलने की जिम्मेदारी भी है। जब किसी व्यक्ति को जनप्रतिनिधि बनने का अवसर मिलता है तो उसके सामने सिर्फ एक कुर्सी नहीं आती, बल्कि हजारों-लाखों लोगों की उम्मीदें, समस्याएं और भविष्य की जिम्मेदारी भी आती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब जनप्रतिनिधियों के पास काम करने का अवसर है, शासन-प्रशासन तक सीधी पहुंच है और विकास के लिए योजनाएं एवं संसाधन उपलब्ध हैं, तो फिर जनहित के बड़े मुद्दों पर अपेक्षित सक्रियता दिखाई क्यों नहीं देती?छत्तीसगढ़ ने अपनी अलग पहचान केवल प्राकृतिक संपदा के कारण नहीं बनाई, बल्कि यहां की लोकसंस्कृति, परंपराओं, लोककलाओं और छत्तीसगढ़ी भाषा ने भी प्रदेश की अस्मिता को मजबूत किया है। छत्तीसगढ़ी केवल बातचीत का माध्यम नहीं, बल्कि इस माटी की स्मृतियों, लोकजीवन और भावनाओं को अपने भीतर समेटे हुए भाषा है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस भाषा और संस्कृति को राजनीतिक मंचों पर सम्मान देने की बातें होती हैं, उसके संरक्षण, संवर्धन और व्यापक उपयोग के लिए जमीन पर ठोस प्रयास कितने हो रहे हैं, यह सवाल आज भी अपनी जगह खड़ा है।जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि विकास का अर्थ केवल सड़क, नाली, भवन और पुल-पुलिया तक सीमित नहीं है। विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा समाज की भाषा, संस्कृति, शिक्षा, रोजगार, स्थानीय प्रतिभाओं और आने वाली पीढ़ी की पहचान को मजबूत करना भी है। यदि आज छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण और उसके संस्थागत विस्तार को लेकर ठोस पहल नहीं हुई तो आने वाली पीढ़ियां अपनी ही लोकभाषा और सांस्कृतिक विरासत से दूर होती चली जाएंगी।“कुर्सी मिली है तो कर्तव्य भी निभाना होगा,जनता ने जो भरोसा दिया, उसे लौटाना होगा…”जनप्रतिनिधियों के सामने आज अनेक अवसर हैं। विधानसभा से लेकर स्थानीय निकायों तक नीति निर्माण में प्रभाव डालने की क्षमता है। सरकार के पास बजट है, विभागों के पास योजनाएं हैं और जनप्रतिनिधियों के पास जनता की आवाज को सरकार तक पहुंचाने का अधिकार है। ऐसे में जरूरत केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि ऐसी योजनाओं की है जिनका सीधा लाभ आम छत्तीसगढ़िया समाज को मिले।छत्तीसगढ़ी भाषा को शिक्षा, प्रशासन, सांस्कृतिक गतिविधियों और सार्वजनिक जीवन में अधिक प्रभावी स्थान दिलाने की दिशा में क्या किया जा सकता है, इस पर गंभीर विमर्श होना चाहिए। स्थानीय साहित्यकारों, कलाकारों, लोक कलाकारों, रंगकर्मियों और भाषा के जानकारों को प्रोत्साहन देने की योजनाएं बनाई जा सकती हैं। गांव-गांव की लोकसंस्कृति और परंपराओं का दस्तावेजीकरण कराया जा सकता है। छत्तीसगढ़ी साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है।सवाल यह भी है कि क्या जनप्रतिनिधियों का दायित्व केवल अपने क्षेत्र की छोटी-बड़ी राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित है? क्या उन्हें प्रदेश के व्यापक हित में दीर्घकालीन सोच विकसित नहीं करनी चाहिए? यदि किसी जनप्रतिनिधि को अवसर मिला है तो उस अवसर का उपयोग व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य बनाने से ज्यादा प्रदेश के भविष्य को मजबूत करने में होना चाहिए।आज जनता भी सवाल पूछ रही है कि आखिर चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़िया और छत्तीसगढ़ी अस्मिता की बातें इतनी प्रभावी क्यों हो जाती हैं और चुनाव के बाद वही मुद्दे प्राथमिकता सूची से क्यों गायब हो जाते हैं? भाषा और संस्कृति के नाम पर भावनाएं जगाना आसान है, लेकिन उन्हें नीति और योजनाओं में बदलना ही वास्तविक जनसेवा है।“बातों से नहीं बदलेगा वक्त का आईना,कुछ करना पड़ेगा, तभी बदलेगा ये नगीना…”छत्तीसगढ़ को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी केवल मुख्यमंत्री, मंत्रियों या प्रशासनिक अधिकारियों की नहीं है। हर सांसद, विधायक, महापौर, नगर पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्य और अन्य निर्वाचित प्रतिनिधि इस जिम्मेदारी का हिस्सा हैं। जनप्रतिनिधियों को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाकर काम करना होगा।जनता को भी अब केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कौन नेता कितनी बड़ी घोषणा करता है, बल्कि यह देखना चाहिए कि किसने अपने कार्यकाल में वास्तव में क्या किया। किसने स्थानीय भाषा के लिए आवाज उठाई? किसने शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे को मजबूती से उठाया? किसने युवाओं और स्थानीय प्रतिभाओं के लिए अवसर पैदा किए? किसने भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ आवाज बुलंद की? और किसने अपने क्षेत्र के साथ-साथ पूरे छत्तीसगढ़ के हित में दीर्घकालीन सोच रखी?क्योंकि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता का मालिक नहीं, बल्कि जनता का प्रतिनिधि होता है। उसे मिले पद की असली कीमत उसके सरकारी वाहन, सुरक्षा व्यवस्था या राजनीतिक प्रभाव से नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए जनहित के कामों से तय होती है।आज जरूरत है कि जनप्रतिनिधि राजनीति की पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर प्रदेश की भाषा, संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक विकास को लेकर स्पष्ट रोडमैप तैयार करें। छत्तीसगढ़ को केवल खनिज और औद्योगिक प्रदेश के रूप में नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध भाषा और संस्कृति के साथ आगे बढ़ने वाला आधुनिक राज्य बनाया जाए।“अवसर मिला है तो इतिहास बनाइए,सिर्फ नाम नहीं, छत्तीसगढ़ का भविष्य बनाइए…”आखिरकार सवाल किसी एक दल या किसी एक जनप्रतिनिधि का नहीं है। सवाल उस पूरी राजनीतिक व्यवस्था से है जिसे जनता ने प्रदेश के बेहतर भविष्य के लिए चुना है। अवसर हर जनप्रतिनिधि को मिला है, संसाधन भी हैं और अधिकार भी। अब आवश्यकता केवल उस सोच की है जो पद को प्रतिष्ठा नहीं, जिम्मेदारी समझे।यदि जनप्रतिनिधि सचमुच छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ियों के हित में कुछ बेहतर करना चाहते हैं तो उन्हें घोषणाओं और नारों से आगे बढ़कर धरातल पर काम करना होगा। छत्तीसगढ़ी भाषा को सम्मान, स्थानीय संस्कृति को संरक्षण, युवाओं को अवसर और आम जनता को बेहतर व्यवस्था—यही वह दिशा है जिसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई देनी चाहिए।क्योंकि मौका बार-बार नहीं मिलता और जनप्रतिनिधित्व उससे भी बड़ा अवसर है। इतिहास उन्हीं लोगों को याद रखता है जिन्हें पद मिला और जिन्होंने उस पद का इस्तेमाल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए किया।अब सवाल यही है—अवसर मिला है, तो काम कब होगा?जनता इंतजार में है… और इतिहास जवाब मांग रहा है।



