
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
लाठियाँ जब जवाब बन जाएँ, तब लोकतंत्र कटघरे में खड़ा होता हैलोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि सत्ता कितनी शक्तिशाली है, बल्कि यह है कि वह अपने असहमत नागरिकों की आवाज़ को कितने धैर्य और सम्मान से सुनती है।
जब देश की राजधानी के जंतर-मंतर पर अपने अधिकारों, रोजगार और भविष्य की मांग लेकर पहुँचे युवाओं का स्वागत संवाद से नहीं, बल्कि लाठियों से होता है, तब सवाल केवल एक घटना का नहीं रह जाता—सवाल लोकतंत्र की आत्मा का बन जाता है।
देश का युवा आज रोजगार मांग रहा है, पारदर्शिता मांग रहा है, अवसरों में समानता मांग रहा है। लेकिन यदि उसके हाथ में तख्ती देखकर सत्ता के हाथ में लाठी आ जाए, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है। सत्ता की असली ताकत विरोध को कुचलने में नहीं, बल्कि विरोध को सुनने में होती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने युवाओं को अनेक सपने दिखाए—विश्वगुरु भारत, विकसित भारत, अमृतकाल और आत्मनिर्भर भारत। लेकिन जब इन्हीं सपनों को सच करने वाली पीढ़ी अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरती है और उसे बल प्रयोग का सामना करना पड़ता है, तो यह विरोधाभास स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनता है।सरकारों को यह याद रखना चाहिए कि लाठी कभी भी तर्क का विकल्प नहीं बन सकती। लोकतंत्र में असहमति राष्ट्रविरोध नहीं होती, बल्कि शासन को आईना दिखाने का संवैधानिक माध्यम होती है।
इतिहास बताता है कि जिन सरकारों ने संवाद का रास्ता छोड़ा, उन्हें अंततः जनता के कठोर प्रश्नों का सामना करना पड़ा।युवाओं की आवाज़ दबाकर कुछ समय के लिए सन्नाटा तो बनाया जा सकता है, लेकिन विश्वास नहीं जीता जा सकता। लोकतंत्र में सबसे बड़ा सुरक्षा कवच पुलिस की लाठी नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होता है। यदि वह भरोसा दरकने लगे, तो सत्ता की सबसे ऊँची दीवारें भी उसे बचा नहीं सकतीं।लोकतंत्र का सौंदर्य यही है कि सत्ता प्रश्नों से भागती नहीं, उनका उत्तर देती है।
क्योंकि जिस दिन सवालों का जवाब लाठियाँ देने लगेंगी, उस दिन लोकतंत्र का सबसे बड़ा घाव संविधान नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होगा।”सत्ता बदलती रहती है, लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है, जब सरकार अपने विरोधियों की आवाज़ सुनने का साहस दिखाती है।
इतिहास लाठी चलाने वालों को नहीं, संवाद का रास्ता चुनने वालों को याद रखता है।”




