
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों केवल राजनीतिक समीकरण ही चर्चा का विषय नहीं हैं। सत्ता के गलियारों से निकलकर अब प्रशासनिक तंत्र के भीतर की हलचल भी चर्चा का विषय बनने लगी है। सरकार और प्रशासन के बीच तालमेल को लेकर उठते सवाल यह संकेत दे रहे हैं कि कहीं न कहीं शासन और नौकरशाही के बीच भरोसे की वह सहजता नहीं रह गई है, जो किसी भी सरकार के सुचारु संचालन के लिए जरूरी होती है।राजनीतिक सत्ता के पास जनादेश होता है और प्रशासन के पास उस जनादेश को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। लेकिन जब राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक मशीनरी के बीच संवाद कमजोर होता है, तो उसका असर फाइलों से निकलकर योजनाओं और अंततः जनता तक पहुंचता है।छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक स्तर पर नाराजगी की चर्चाओं को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरा प्रशासन सरकार से नाराज है, लेकिन यदि अलग-अलग विभागों और प्रशासनिक हलकों में असंतोष की बातें लगातार सामने आती हैं, तो सरकार के लिए इसे नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी।राजनीतिक नेतृत्व की प्राथमिकताएं और प्रशासन की अपनी चुनौतियांसरकारें राजनीतिक घोषणाओं और जन अपेक्षाओं के दबाव में तेजी से निर्णय लेती हैं। दूसरी ओर अधिकारी किसी भी निर्णय के वित्तीय, कानूनी और प्रशासनिक पक्ष को देखते हैं। दोनों के बीच यही स्वाभाविक अंतर कई बार टकराव का कारण बन जाता है।समस्या तब गंभीर होती है जब अधिकारियों को लगे कि उनकी व्यावहारिक आपत्तियों या सुझावों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। वहीं राजनीतिक नेतृत्व के सामने यह चुनौती रहती है कि जनता ने उसे काम करने का जनादेश दिया है और प्रशासनिक प्रक्रिया के नाम पर निर्णयों में अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जा सकती।यही वह बिंदु है जहां संवाद की आवश्यकता सबसे अधिक होती है।नौकरशाही का मनोबल भी शासन का हिस्सा हैसरकार चाहे कितनी भी मजबूत क्यों न हो, वह प्रशासनिक मशीनरी के बिना प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकती। जिलों में योजनाओं का क्रियान्वयन, कानून-व्यवस्था, राजस्व प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी कार्यक्रम—इन सभी की सफलता अंततः प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों पर निर्भर करती है।यदि प्रशासनिक तंत्र में यह धारणा मजबूत होती है कि निर्णय लगातार बदल रहे हैं, जिम्मेदारी तो तय हो रही है लेकिन अधिकार पर्याप्त नहीं हैं या राजनीतिक दबाव के कारण स्वतंत्र रूप से काम करना कठिन हो रहा है, तो इससे मनोबल प्रभावित होना स्वाभाविक है।इसके विपरीत प्रशासन को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में अंतिम जवाबदेही निर्वाचित सरकार की होती है। अधिकारी नीति निर्धारित नहीं करते, बल्कि सरकार द्वारा निर्धारित नीतियों को लागू करते हैं। इसलिए प्रशासनिक निष्पक्षता और राजनीतिक जवाबदेही के बीच संतुलन जरूरी है।संगठन और सरकार के बीच भी तालमेल की परीक्षाछत्तीसगढ़ की राजनीति में भाजपा सरकार के सामने प्रशासनिक चुनौती के साथ संगठनात्मक संतुलन की चुनौती भी है। सत्ता और संगठन के बीच बेहतर तालमेल किसी भी राजनीतिक दल की मजबूती का आधार होता है। यदि संगठन के कार्यकर्ताओं को लगे कि उनकी बात सरकार तक नहीं पहुंच रही है और प्रशासनिक स्तर पर उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा है, तो धीरे-धीरे असंतोष राजनीतिक रूप ले सकता है।यही कारण है कि सरकार के लिए केवल विपक्ष के सवालों का जवाब देना पर्याप्त नहीं है। उसे अपने राजनीतिक संगठन, जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों—तीनों के बीच संवाद का मजबूत तंत्र खड़ा करना होगा।क्या नाराजगी राजनीतिक मुद्दा बनेगी?फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रशासनिक असंतोष की चर्चाएं क्या आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनेंगी?यदि सरकार प्रशासनिक तंत्र के साथ संवाद बढ़ाती है, अधिकारियों की व्यावहारिक समस्याओं को सुनती है और निर्णय प्रक्रिया में स्पष्टता लाती है, तो यह असंतोष समय रहते दूर किया जा सकता है। लेकिन यदि सत्ता यह मानकर चले कि प्रशासन को केवल आदेश का पालन करना है और प्रशासन यह मानने लगे कि राजनीतिक नेतृत्व उसकी कठिनाइयों को समझना नहीं चाहता, तो दोनों के बीच दूरी बढ़ना तय है।राजनीति में असंतोष अचानक विस्फोट के रूप में सामने नहीं आता। पहले वह फुसफुसाहट बनता है, फिर चर्चा और अंततः मुद्दा।सरकार के लिए चेतावनी भी, अवसर भीछत्तीसगढ़ सरकार के लिए वर्तमान स्थिति को केवल आलोचना के रूप में देखने के बजाय चेतावनी और अवसर—दोनों के रूप में देखना चाहिए। यदि वास्तव में प्रशासनिक स्तर पर असहजता है तो उसका समाधान दंडात्मक रवैये से नहीं, संवाद से होगा।सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि अधिकारियों को स्पष्ट दिशा मिले, नीतिगत निर्णयों में स्थिरता हो और जिम्मेदारी के साथ काम करने का वातावरण भी मिले। वहीं प्रशासन को भी सरकार की प्राथमिकताओं को समझते हुए परिणाम देने की संस्कृति विकसित करनी होगी।आखिरकार सरकार और प्रशासन की लड़ाई में जीत किसी की नहीं होती। नुकसान जनता का होता है।छत्तीसगढ़ की जनता ने सरकार को पांच साल के लिए जनादेश दिया है। अब जनता को राजनीतिक खींचतान नहीं, परिणाम चाहिए। उसे बेहतर सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं का प्रभावी लाभ चाहिए।इसलिए आने वाला समय केवल मुख्यमंत्री और मंत्रियों की राजनीतिक क्षमता की परीक्षा नहीं होगा। यह परीक्षा इस बात की भी होगी कि सरकार सत्ता और प्रशासन के बीच भरोसे का पुल कितना मजबूत बना पाती है।क्योंकि मजबूत सरकार केवल वह नहीं होती जो कठोर निर्णय ले सके। मजबूत सरकार वह होती है जो अपने प्रशासन को साथ लेकर चले, संगठन को विश्वास में रखे और जनता को परिणाम दे।छत्तीसगढ़ की राजनीति में अब असली सवाल यही है—क्या सरकार समय रहते प्रशासन के भीतर उठ रही नाराजगी की आवाज सुन पाएगी?




