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लिखते रहिए, फरियाद करते रहिए… काम तो उसी का होगा जो पैसा देगा!”-वरिष्ठ अफसर की बेबाक बात ने खोली सिस्टम की कथित हकीकत, फरियादियों के लिए व्यवस्था पर बड़ा सवाल।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

सरकारी दफ्तरों में आम आदमी अपनी समस्या लेकर पहुंचता है तो उसे उम्मीद होती है कि नियम-कायदे और न्याय के आधार पर उसकी सुनवाई होगी। आवेदन देगा, शिकायत करेगा, अधिकारियों से मिलेगा और अंततः उसे न्याय मिलेगा। लेकिन यदि व्यवस्था के भीतर से ही कोई वरिष्ठ अधिकारी यह कह दे कि “लिखते रहो, अफसरों से फरियाद करते रहो, हकीकत यह है कि पैसा देगा उसी का काम होगा”, तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली पर खड़ा हो जाता है।‘सर्वव्यापी’ से बातचीत के दौरान एक वरिष्ठ अफसर ने कथित तौर पर सिस्टम की ऐसी तस्वीर पेश की, जिसे सुनकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर आम आदमी अपनी फरियाद लेकर जाए तो जाए कहां? क्या आवेदन, शिकायत, जनदर्शन, सीएम हेल्पलाइन और अधिकारियों के समक्ष की जाने वाली गुहार सिर्फ कागजों का पुलिंदा बनकर रह गई है?व्यंग्यात्मक स्थिति यह है कि फरियादी महीनों तक आवेदन लेकर घूमता रहे, एक टेबल से दूसरी टेबल तक फाइल पहुंचाता रहे और अधिकारियों के दरवाजे पर दस्तक देता रहे, जबकि दूसरी ओर कथित तौर पर “पैसे की ताकत” से काम आसानी से होने की चर्चा हो। अगर यह बात वास्तव में कहीं हो रही है तो यह शासन की उस मूल भावना पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जिसमें बिना भेदभाव के नागरिकों को सेवाएं और न्याय देने का दावा किया जाता है।सरकारें बदलती हैं, नारे बदलते हैं, अधिकारियों के चेहरे बदलते हैं, लेकिन यदि व्यवस्था में भ्रष्टाचार और कथित लेन-देन की मानसिकता बनी रहती है तो आम नागरिक के लिए बदलाव आखिर किस काम का? “जीरो टॉलरेंस” की बातें तभी सार्थक होंगी, जब शिकायत करने वाले व्यक्ति को यह भरोसा हो कि उसका काम उसकी पात्रता और अधिकार के आधार पर होगा, जेब की क्षमता के आधार पर नहीं।सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी को भी व्यवस्था की ऐसी हकीकत दिखाई दे रही है, तो फिर जिम्मेदार कौन है? क्या ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या शिकायतों की निगरानी केवल पोर्टल और फाइलों तक सीमित रहेगी या वास्तव में यह देखा जाएगा कि शिकायतकर्ता का काम हुआ भी या नहीं?फिलहाल ‘सर्वव्यापी’ उस कथित टिप्पणी को व्यवस्था के लिए आईना मानता है। क्योंकि कलम का काम सवाल पूछना है और सत्ता-प्रशासन का काम उन सवालों का जवाब देना। अगर जवाब यह हो कि “लिखते रहो, फरियाद करते रहो”, तो फिर लोकतंत्र में आम आदमी के लिए न्याय का रास्ता आखिर कौन सा है?

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