Newsछत्तीसगढ़

शिक्षा सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह और मुख्यमंत्री सचिवालय से सवाल—बिलासपुर का डीईओ पद आखिर क्यों खाली? अजय के सेवानिवृत्त होते ही फिर सहायक संचालक वर्षा को अतिरिक्त प्रभार, क्या प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में स्थायी डीईओ की नियुक्ति भी अब प्राथमिकता नहीं।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के इतिहास में शायद यह पहला अवसर है जब प्रदेश के प्रमुख जिलों में शामिल बिलासपुर का जिला शिक्षा विभाग लगातार सहायक संचालक स्तर के अधिकारियों के भरोसे संचालित होता दिखाई दे रहा है। शिक्षा व्यवस्था की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बिलासपुर जिले में नियमित जिला शिक्षा अधिकारी की पदस्थापना नहीं होना अब महज प्रशासनिक व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है, बल्कि सीधे तौर पर स्कूल शिक्षा विभाग के उच्च स्तर की कार्यप्रणाली और मुख्यमंत्री सचिवालय की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। 31 अगस्त को प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी के रूप में कार्यरत सहायक संचालक अजय कौशिक सेवानिवृत्त हो गए। उनके सेवानिवृत्त होते ही विभाग ने एक बार फिर स्थायी डीईओ की नियुक्ति करने के बजाय डीईओ कार्यालय में पदस्थ सहायक संचालक वर्षा शर्मा को जिला शिक्षा अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया है। यानी जिस जिले को पूर्णकालिक जिला शिक्षा अधिकारी की आवश्यकता है, वहां अब भी अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था कायम है।सवाल यह है कि आखिर बिलासपुर जैसे महत्वपूर्ण जिले में नियमित जिला शिक्षा अधिकारी की नियुक्ति को लेकर शासन स्तर पर इतनी उदासीनता क्यों दिखाई जा रही है? क्या शिक्षा विभाग में योग्य अधिकारियों का अभाव है या फिर शासन स्तर पर इस पद को प्राथमिकता ही नहीं दी जा रही है? यदि किसी बड़े जिले की शिक्षा व्यवस्था महीनों तक प्रभारी अधिकारी के भरोसे चलती है और एक प्रभारी अधिकारी के सेवानिवृत्त होते ही दूसरे सहायक संचालक को अतिरिक्त प्रभार देकर व्यवस्था आगे बढ़ा दी जाती है, तो निश्चित रूप से यह व्यवस्था की गंभीर समीक्षा का विषय होना चाहिए।सबसे बड़ा सवाल शिक्षा सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहा है। स्कूल शिक्षा विभाग प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण विभाग है और जिला शिक्षा अधिकारी जिले में विभागीय योजनाओं, स्कूलों की निगरानी, शिक्षकों से जुड़े प्रशासनिक मामलों, निरीक्षण, अनुशासन, शैक्षणिक व्यवस्था तथा शासन की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन की महत्वपूर्ण कड़ी होता है। ऐसे पद को नियमित नियुक्ति के बजाय लगातार अतिरिक्त प्रभार के भरोसे चलाना विभागीय प्रशासन की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। क्या शिक्षा सचिव के स्तर पर बिलासपुर के डीईओ पद की आवश्यकता और महत्व की समीक्षा नहीं हुई? क्या शासन को यह जानकारी नहीं है कि नियमित डीईओ के अभाव में जिले की शिक्षा व्यवस्था किस प्रशासनिक स्थिति से गुजर रही है?अजय कौशिक के सेवानिवृत्त होने की स्थिति कोई अचानक पैदा हुई परिस्थिति नहीं थी। उनकी सेवानिवृत्ति की तारीख पहले से निर्धारित थी। ऐसे में सवाल यह भी है कि शिक्षा विभाग ने उनके सेवानिवृत्त होने से पहले ही बिलासपुर के लिए नियमित जिला शिक्षा अधिकारी की पदस्थापना क्यों नहीं की? यदि विभाग को पता था कि 31 अगस्त के बाद डीईओ का पद रिक्त होने वाला है, तो 1 सितंबर से अतिरिक्त प्रभार देने की नौबत क्यों आई? क्या शासन स्तर पर समय रहते निर्णय नहीं लिया जा सकता था?अब गेंद केवल स्कूल शिक्षा विभाग के पाले में नहीं है। मुख्यमंत्री सचिवालय को भी इस मामले को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार लगातार सुशासन, जवाबदेही और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने की बात करती रही है। ऐसे में मुख्यमंत्री सचिवालय के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह को बिलासपुर की इस स्थिति की समीक्षा कर यह देखना चाहिए कि आखिर प्रदेश के महत्वपूर्ण जिले का शिक्षा विभाग नियमित डीईओ के बजाय अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था में क्यों चल रहा है। मुख्यमंत्री सचिवालय यदि शासन की कार्यप्रणाली पर प्रभावी निगरानी रखता है तो बिलासपुर का यह मामला उस निगरानी की वास्तविक परीक्षा भी है।बिलासपुर संभागीय मुख्यालय होने के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां बड़ी संख्या में शासकीय विद्यालय, शिक्षक, विद्यार्थी और विभागीय संस्थाएं हैं। ऐसे में जिला शिक्षा अधिकारी का पद केवल एक प्रशासनिक कुर्सी नहीं, बल्कि जिले की पूरी स्कूली शिक्षा व्यवस्था के संचालन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इस पद पर नियमित अधिकारी की अनुपस्थिति से अधीनस्थ कार्यालयों में निर्णय लेने की प्रक्रिया, जवाबदेही और प्रशासनिक नियंत्रण प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है।सहायक संचालक को अतिरिक्त प्रभार देना अपने आप में गलत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रशासनिक परिस्थितियों में सरकार को अस्थायी व्यवस्था करने का अधिकार है। लेकिन सवाल तब गंभीर होता है जब अस्थायी व्यवस्था ही स्थायी स्वरूप लेने लगे। बिलासपुर में यही स्थिति अब चर्चा का विषय बन गई है। पहले सहायक संचालक अजय कौशिक प्रभारी डीईओ रहे और उनके सेवानिवृत्त होते ही अब सहायक संचालक वर्षा शर्मा को अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया। इससे यह संदेश जा रहा है कि नियमित डीईओ की नियुक्ति फिलहाल शासन की प्राथमिकता में नहीं है।अब आवश्यकता इस बात की है कि मुख्यमंत्री सचिवालय और स्कूल शिक्षा विभाग इस मामले में केवल नया प्रभार आदेश जारी करने तक सीमित न रहें, बल्कि बिलासपुर जिला शिक्षा अधिकारी के नियमित पद पर शासन स्तर से सक्षम अधिकारी की तत्काल नियुक्ति करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि नियमित डीईओ की नियुक्ति में विलंब क्यों हुआ और भविष्य में प्रदेश के किसी भी महत्वपूर्ण जिले को लंबे समय तक प्रभारी व्यवस्था के भरोसे चलाने की नौबत क्यों न आए।बिलासपुर के शिक्षा जगत, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच अब यही सवाल उठ रहा है कि जब सरकार के पास प्रशासनिक अधिकारियों की पूरी व्यवस्था है, विभागीय सचिव स्तर पर निर्णय लेने की शक्ति है और मुख्यमंत्री सचिवालय के पास निगरानी का तंत्र है, तो फिर बिलासपुर को नियमित डीईओ क्यों नहीं मिल पा रहा है?अब सवाल सहायक संचालक वर्षा शर्मा के अतिरिक्त प्रभार का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसने बिलासपुर जैसे महत्वपूर्ण जिले में नियमित डीईओ की नियुक्ति की आवश्यकता को ही पीछे कर दिया है। शिक्षा सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह और मुख्यमंत्री सचिवालय को अब इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि बिलासपुर जिला शिक्षा विभाग को आखिर कब मिलेगा उसका नियमित जिला शिक्षा अधिकारी?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!