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आस्था का महासंगम या अव्यवस्था का अड्डा? कुबेश्वर धाम में गंदगी का साम्राज्य, बदबू से बीमारी को न्यौता..हर दिन लाखों श्रद्धालुओं की आमद, कांवड़ियों का विशाल जमावड़ा—विश्व प्रसिद्ध कथाव्यास पंडित प्रदीप मिश्रा की संस्था पर उठे सफाई और व्यवस्था के गंभीर सवाल।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

सीहोर (मध्यप्रदेश)। आस्था, विश्वास और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा का विशाल केंद्र बन चुके सीहोर जिले के विश्व प्रसिद्ध कुबेश्वर धाम में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ रहा है। देश के कोने-कोने से शिवभक्त और कांवड़िए यहां पहुंच रहे हैं। विश्व प्रसिद्ध शिवपुराण कथाव्यास पंडित प्रदीप मिश्रा की कथा और रुद्राक्ष वितरण को लेकर लाखों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन कुबेश्वर धाम पहुंचते हैं। लेकिन इतनी बड़ी धार्मिक व्यवस्था के बीच साफ-सफाई, स्वच्छता और मूलभूत सुविधाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।धाम परिसर और उसके आसपास फैली गंदगी, कचरे के ढेर, अव्यवस्थित अस्थायी व्यवस्थाएं और दुर्गंध अब केवल असुविधा का विषय नहीं रह गए हैं, बल्कि श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य के लिए भी खतरे की घंटी बजा रहे हैं। श्रद्धालुओं का आरोप है कि जहां करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है और प्रतिदिन भारी संख्या में लोग पहुंचते हैं, वहां स्वच्छता की व्यवस्था उस स्तर की दिखाई नहीं देती, जिसकी ऐसे विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल से अपेक्षा की जाती है।आस्था के नाम पर लाखों की भीड़, लेकिन सफाई की जिम्मेदारी किसकी?कुबेश्वर धाम में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आगमन होता है। विशेष अवसरों और कांवड़ यात्रा के दौरान यह संख्या लाखों तक पहुंच जाती है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से भोजन, पानी, अस्थायी निवास, शौचालय और कचरा प्रबंधन की व्यापक व्यवस्था आवश्यक होती है। सवाल यह है कि जब लाखों श्रद्धालुओं के आने की जानकारी पहले से होती है, तब परिसर और आसपास की सफाई के लिए स्थायी और मजबूत तंत्र क्यों नहीं बनाया गया?श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने के साथ कचरे का बोझ भी बढ़ रहा है। खाने-पीने की सामग्री, प्लास्टिक, पत्तल-दोने और अन्य अपशिष्ट के निस्तारण की प्रभावी व्यवस्था नहीं होने के आरोप लग रहे हैं। कई स्थानों पर गंदगी और बदबू से श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।बदबू और गंदगी से बीमारी फैलने का खतराधार्मिक आस्था के इस विशाल केंद्र में स्वच्छता की अनदेखी आगे चलकर गंभीर स्वास्थ्य समस्या का रूप ले सकती है। खुले में पड़ा कचरा, गंदा पानी, दुर्गंध और अत्यधिक भीड़ संक्रमण फैलने की आशंका को बढ़ा सकती है। खासकर बरसात और उमस के मौसम में स्थिति और चिंताजनक हो सकती है।बड़े धार्मिक आयोजनों में स्वच्छ पेयजल, पर्याप्त शौचालय, नियमित कचरा उठाव और स्वास्थ्य सुविधाएं केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि लाखों लोगों की सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय हैं। यदि समय रहते ठोस व्यवस्था नहीं की गई तो आस्था का यह विशाल आयोजन स्वास्थ्य संकट को भी आमंत्रित कर सकता है।संस्था और प्रशासन को उठानी होगी जिम्मेदारीसबसे बड़ा सवाल कुबेश्वर धाम की व्यवस्था से जुड़े जिम्मेदार लोगों और स्थानीय प्रशासन से है। लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने के बावजूद यदि साफ-सफाई और बुनियादी व्यवस्थाएं संतोषजनक नहीं हैं, तो इसकी जवाबदेही कौन तय करेगा? क्या संस्था केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित रहेगी या फिर श्रद्धालुओं को स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी उठाएगी?श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान केवल धार्मिक कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि उनकी सुविधा और स्वास्थ्य की चिंता से भी होना चाहिए। कांवड़ियों और दूर-दराज से आने वाले भक्तों को साफ परिसर, शुद्ध पेयजल, पर्याप्त शौचालय और चिकित्सा सुविधा मिलना आवश्यक है।भव्यता के साथ व्यवस्था भी होनी चाहिए विश्वस्तरीयकुबेश्वर धाम अब केवल स्थानीय धार्मिक स्थल नहीं रहा। यह देशभर में प्रसिद्ध आस्था केंद्र बन चुका है। पंडित प्रदीप मिश्रा की शिवमहापुराण कथाओं और धार्मिक आयोजनों से इस धाम की पहचान अंतरराज्यीय और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है। ऐसे में धाम की व्यवस्थाएं भी उसी स्तर की होनी चाहिएं।भक्तों की भीड़ बढ़ने पर केवल धार्मिक आयोजन की भव्यता पर्याप्त नहीं है। गंदगी और दुर्गंध से जूझते श्रद्धालु व्यवस्था पर सवाल उठाएंगे ही। आस्था का केंद्र तब ही वास्तव में पवित्र और आदर्श बनेगा, जब उसके आसपास का वातावरण भी स्वच्छ, सुव्यवस्थित और सुरक्षित होगा।जिम्मेदारों से बड़ा सवालकुबेश्वर धाम में प्रतिदिन उमड़ने वाले लाखों श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा आखिर किसकी जिम्मेदारी है? क्या गंदगी और बदबू के बीच श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन और धार्मिक आयोजन के भरोसे छोड़ दिया जाएगा? क्या संस्था और प्रशासन तब जागेंगे, जब किसी गंभीर बीमारी या अव्यवस्था के कारण बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी?विश्व प्रसिद्ध कथाव्यास पंडित प्रदीप मिश्रा और कुबेश्वर धाम से जुड़ी संस्था को अब इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा। आस्था के इस महासंगम में स्वच्छता, स्वास्थ्य और श्रद्धालुओं की गरिमा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। क्योंकि भगवान शिव के दरबार में आस्था की कमी नहीं है, लेकिन उस आस्था की व्यवस्था में फैली गंदगी को साफ करना अब जिम्मेदारों की सबसे बड़ी परीक्षा है।अब समय है कि कुबेश्वर धाम में केवल श्रद्धालुओं की संख्या नहीं, बल्कि व्यवस्थाओं की गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जाए—क्योंकि लाखों लोगों की आस्था के साथ उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है।

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