
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में सोशल मीडिया पर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से शुरू हुआ विवाद जिस तरह हिंसक झड़प, पथराव और तोड़फोड़ तक पहुंचा, वह केवल कानून-व्यवस्था की घटना नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। खपरगंज-मसानगंज और सिटी कोतवाली क्षेत्र में दोनों पक्षों के आमने-सामने आने तथा पुलिस पर भी पथराव की खबरों ने शहर की शांति और सामाजिक सौहार्द को झकझोर दिया है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिस स्थान पर नागरिक अपनी शिकायत लेकर न्याय की उम्मीद में पहुंचते हैं, वही थाना परिसर तनाव और पथराव का केंद्र बन जाए। यदि किसी व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है तो उसकी जांच और कार्रवाई का अधिकार कानून को है। किसी टिप्पणी का जवाब पत्थर से देना कानून को अपने हाथ में लेना है। इसी तरह किसी घटना के आधार पर पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा करना भी उतना ही खतरनाक है।इस घटना में पुलिसकर्मियों के घायल होने की खबर विशेष रूप से गंभीर है। पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात होती है; पुलिस पर हमला दरअसल राज्य की कानून व्यवस्था को चुनौती है। हालात नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आंसू गैस और बल प्रयोग करना पड़ा तथा वरिष्ठ अधिकारियों को मौके पर पहुंचना पड़ा। लेकिन अब असली परीक्षा प्रशासन की है। कलेक्टर और एसएसपी का मौके पर पहुंचना, अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती और उपद्रवियों की पहचान के लिए सीसीटीवी फुटेज खंगालना तत्काल आवश्यक कदम हैं। आज जिला और पुलिस प्रशासन द्वारा पैदल मार्च कर जनता को यह संदेश देना कि बिलासपुर में कानून का राज कायम है, स्वागत योग्य पहल है। मगर पैदल मार्च केवल प्रतीक न बने; इसके साथ निष्पक्ष जांच, दोषियों की पहचान और कानून के मुताबिक कार्रवाई भी दिखाई देनी चाहिए।यहां प्रशासन को दो बातों का विशेष ध्यान रखना होगा—दोषी व्यक्ति की पहचान उसके कृत्य से हो, उसकी धार्मिक पहचान से नहीं; और पीड़ित को न्याय मिले, लेकिन किसी निर्दोष को केवल भीड़ की धारणा के आधार पर निशाना न बनाया जाए।सोशल मीडिया के दौर में एक टिप्पणी, एक पोस्ट या एक एडिट किया हुआ वीडियो कुछ ही मिनटों में शहर का माहौल बदल सकता है। इसलिए समाज के जिम्मेदार नागरिकों, राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और धर्मगुरुओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पुलिस और प्रशासन की। अफवाहों को रोकना, भड़काऊ संदेशों को आगे न बढ़ाना और विवादित सामग्री को वायरल करने से बचना आज सामाजिक जिम्मेदारी है।बिलासपुर की पहचान हिंसा से नहीं, भाईचारे से है। यहां अलग-अलग समुदाय वर्षों से साथ रहते आए हैं। किसी एक व्यक्ति की कथित गलती का बदला पूरे समाज से लेना न न्याय है, न धर्म और न ही सामाजिक विवेक।आज जब प्रशासन और पुलिस सड़क पर उतरकर पैदल मार्च कर रहे हैं, तब शहरवासियों को भी उनके साथ खड़ा होना होगा। पुलिस अपना काम करे, प्रशासन निष्पक्षता से कार्रवाई करे और समाज शांति बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाए—तभी इस घटना का सही जवाब दिया जा सकेगा।बिलासपुर को किसी विवाद की आग में झुलसने नहीं दिया जा सकता। पत्थर उठाने वाले हाथों की जगह कानून का हाथ मजबूत होना चाहिए और नफरत फैलाने वाली आवाजों की जगह भाईचारे की आवाज बुलंद होनी चाहिए।न्यायधानी का संदेश स्पष्ट होना चाहिए—विवाद हो सकता है, विरोध हो सकता है, शिकायत हो सकती है; लेकिन हिंसा और कानून हाथ में लेने की इजाजत किसी को नहीं।आज बिलासपुर को सबसे ज्यादा जरूरत पुलिस बल की नहीं, सामाजिक एकजुटता और आपसी विश्वास की है। यही इस घटना के बाद न्यायधानी की सबसे बड़ी परीक्षा भी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।



