
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय सरकार के पौने तीन वर्ष के कार्यकाल को लेकर सत्ता के गलियारों में अब केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता से जुड़े राजनीतिक और प्रशासनिक स्तरों पर भी असंतोष की चर्चाएं तेज होने लगी हैं। सरकार की नीतियों, निर्णय प्रक्रिया और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच केंद्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री कार्यालय से राज्य सरकार को जनता के बीच जाकर जमीनी स्तर पर कामकाज को मजबूत करने की नसीहत दिए जाने की राजनीतिक चर्चाएं इस बात का संकेत मानी जा रही हैं कि दिल्ली तक छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक और राजनीतिक कामकाज की वास्तविक तस्वीर पहुंच रही है।प्रदेश में सरकार के गठन के समय यह उम्मीद जताई गई थी कि सरल स्वभाव, ग्रामीण पृष्ठभूमि और संगठन से निकले मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रशासनिक व्यवस्था अधिक संवेदनशील, जवाबदेह और जनता से जुड़ी होगी। लेकिन पौने तीन साल के कार्यकाल के बाद जनता की अपेक्षाओं और सरकारी व्यवस्था के बीच दूरी बढ़ने की चर्चा अब खुले तौर पर होने लगी है। शहरों से लेकर ग्रामीण अंचलों तक जनता की समस्याओं का समय पर निराकरण, विभागीय जवाबदेही, भ्रष्टाचार पर प्रभावी कार्रवाई, विकास कार्यों की गति और अफसरशाही की कार्यशैली को लेकर असंतोष दिखाई दे रहा है।“दिल्ली की नसीहत, आखिर रायपुर की हकीकत क्या है?”राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि केंद्रीय नेतृत्व और पीएम कार्यालय तक यह संदेश पहुंचा है कि सरकार को केवल बैठकों, प्रस्तुतियों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार के मंत्री, जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक तंत्र को मैदान में उतरकर आम जनता की समस्याओं की वास्तविक स्थिति समझनी होगी। योजनाओं की सफलता केवल विभागीय फाइलों और पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन से तय नहीं हो सकती। जब सड़क पर जनता की समस्या बनी रहे, अस्पतालों में व्यवस्था कमजोर हो, सरकारी दफ्तरों में सुनवाई के लिए आम नागरिक भटके और भ्रष्टाचार के आरोप लगातार उठते रहें, तब कागजों पर दिखने वाली उपलब्धियां जनता की नाराजगी को कम नहीं कर सकतीं।यही कारण है कि अब सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या राजधानी के वातानुकूलित कमरों में प्रस्तुत की जा रही तस्वीर और जमीनी हकीकत में कोई अंतर है? यदि सब कुछ व्यवस्थित है तो जनता के बीच असंतोष क्यों है और यदि असंतोष वास्तविक है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?“जनता ही नहीं, अफसर भी खुश नहीं!”सूत्रों और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा लंबे समय से चल रही है कि राज्य के अनेक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी भी सरकार की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं हैं। बार-बार होने वाले प्रशासनिक फेरबदल, निर्णयों में देरी, स्पष्ट दिशा-निर्देशों की कमी, विभागीय समन्वय का अभाव और कई स्तरों पर अनावश्यक हस्तक्षेप जैसी शिकायतें शासन-प्रशासन के भीतर सुनी जा रही हैं।वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि किसी भी सरकार की सफलता के लिए राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक तंत्र के बीच विश्वास, स्पष्टता और निरंतर संवाद आवश्यक है। लेकिन यदि वरिष्ठ अधिकारियों को यह स्पष्ट नहीं होगा कि सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं और किसी महत्वपूर्ण निर्णय पर अंतिम दिशा किस स्तर से मिलेगी, तो इसका सीधा प्रभाव विकास योजनाओं और प्रशासनिक निर्णयों की गति पर पड़ना स्वाभाविक है।कई महत्वपूर्ण विभागों में अधिकारियों पर अतिरिक्त प्रभार, लंबे समय से लंबित नियुक्तियां, पदस्थापना को लेकर असमंजस और जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन न होना भी प्रशासनिक कार्यक्षमता पर सवाल खड़े करता है। प्रदेश की जनता को सुशासन चाहिए, लेकिन सुशासन के लिए प्रशासन को भी स्थिरता, स्पष्ट दिशा और निर्णय लेने की स्वतंत्रता चाहिए।“फाइलों में सुशासन, मैदान में इंतजार!”छत्तीसगढ़ सरकार लगातार सुशासन और पारदर्शिता की बात करती रही है। यह दावा भी किया जाता रहा है कि सरकार बनने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक सुधार हुआ है। लेकिन जमीनी स्तर पर आम जनता का अनुभव अलग तस्वीर पेश करता है। सरकारी कार्यालयों में छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए महीनों तक इंतजार, शिकायतों के बाद भी कार्रवाई में देरी, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल और विभागीय भ्रष्टाचार के आरोप सरकार के दावों पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।जनता का असंतोष केवल राजनीतिक नहीं होता। आम नागरिक उस सरकार से नाराज होता है, जिसकी योजनाओं का लाभ उसे समय पर नहीं मिलता। किसान को अपनी समस्या का समाधान चाहिए, युवाओं को रोजगार और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता चाहिए, मरीज को अस्पताल में बेहतर इलाज चाहिए, विद्यार्थियों को शिक्षा व्यवस्था चाहिए और आम नागरिक को भ्रष्टाचार से मुक्त सरकारी व्यवस्था चाहिए। इन बुनियादी सवालों का समाधान किए बिना केवल बड़े आयोजनों और घोषणाओं के सहारे जनता का विश्वास लंबे समय तक बनाए रखना आसान नहीं होगा।“सरकार को जनता के बीच जाना होगा”केंद्रीय स्तर से जमीनी कामकाज पर जोर दिए जाने की चर्चा को छत्तीसगढ़ सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यह समय सरकार के लिए आत्ममंथन का है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों, सांसदों और विधायकों तक सभी को यह समझना होगा कि जनता पांच वर्ष पूरे होने का इंतजार नहीं करती। जनता अपने दैनिक अनुभव के आधार पर सरकार का मूल्यांकन करती है।प्रदेश में प्रशासनिक दौरे बढ़ाने, योजनाओं की अचानक समीक्षा करने, जिलों में बिना पूर्व सूचना के व्यवस्था की वास्तविक स्थिति देखने और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई करने की जरूरत है। अधिकारियों से केवल बैठक लेकर रिपोर्ट मांगने के बजाय उनके कामकाज की वास्तविक स्थिति को मैदान में जाकर देखना होगा।“पौने तीन साल में परीक्षा, आगे का समय और कठिन”सरकार का कार्यकाल धीरे-धीरे महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ पर पहुंच रहा है। अब केवल शुरुआती समय का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचना संभव नहीं होगा। जनता अब परिणाम मांग रही है। जिन समस्याओं का समाधान चुनाव के दौरान देने का वादा किया गया था, उन पर वास्तविक प्रगति दिखाई देनी चाहिए।विपक्ष भी आने वाले समय में इन्हीं मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी करेगा। लेकिन सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि जनता की नाराजगी है। विपक्ष की आलोचना का जवाब राजनीतिक मंचों से दिया जा सकता है, लेकिन जनता के असंतोष का जवाब केवल काम से ही दिया जा सकता है।“समय रहते संभलना होगा”छत्तीसगढ़ की राजनीति में सरकारों का मूल्यांकन अब पहले की तुलना में अधिक तेज गति से होने लगा है। सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और स्थानीय पत्रकारिता के कारण गांव और कस्बे की समस्याएं भी सीधे प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच रही हैं। ऐसे में सरकार को यह मानकर चलना होगा कि केवल राजधानी में सक्रिय रहना पर्याप्त नहीं है।“जो सरकार जनता के बीच रहती है, वही जनता के दिल में रहती है; और जो सरकार केवल रिपोर्टों पर भरोसा करती है, उसे चुनाव के समय जनता की रिपोर्ट का इंतजार करना पड़ता है।”विष्णु देव साय सरकार के सामने अभी समय है। केंद्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री कार्यालय की जमीनी स्तर पर काम करने की नसीहत को केवल औपचारिक सलाह मानने के बजाय यदि इसे प्रशासनिक सुधार के अवसर के रूप में लिया जाता है, तो सरकार की कार्यशैली में बड़ा परिवर्तन संभव है। लेकिन यदि जनता की शिकायतें, वरिष्ठ अधिकारियों का असंतोष और प्रशासनिक तंत्र की कमजोरियों को नजरअंदाज किया गया, तो पौने तीन साल का असंतोष आने वाले समय में सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है।अंतिम सवाल“सत्ता की चमक में जनता की आहट कहीं दब तो नहीं गई,सरकार के पास आंकड़े हैं, मगर सच्चाई छुप तो नहीं गई।दिल्ली ने भी अब मैदान में उतरने की बात कह दी है,तो रायपुर के हुक्मरानों… जनता से दूरी बढ़ तो नहीं गई?”




