
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
राज्य के विभिन्न जिलों में लंबे समय से पदस्थ अतिरिक्त कलेक्टर एवं सहायक कलेक्टरों के तबादले नहीं होने से प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। एक ओर कई जिलों में आवश्यकता से अधिक अधिकारी पदस्थ हैं, वहीं दूसरी ओर नवगठित एवं दूरस्थ जिलों में इन अधिकारियों के महत्वपूर्ण पद अब भी रिक्त हैं। इससे प्रशासनिक कार्यों के सुचारु संचालन पर भी असर पड़ने की चर्चा है।प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि सामान्यतः समय-समय पर अधिकारियों का स्थानांतरण किया जाता है, ताकि प्रशासन में पारदर्शिता, निष्पक्षता और कार्यकुशलता बनी रहे। लेकिन कई अतिरिक्त एवं सहायक कलेक्टर वर्षों से एक ही जिले में कार्यरत हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर उनके स्थानांतरण में देरी क्यों हो रही है।सूत्रों के अनुसार कई जिलों में अतिरिक्त कलेक्टरों की संख्या आवश्यकता से अधिक है, जबकि कुछ नए जिलों एवं दूरस्थ क्षेत्रों में अधिकारियों की कमी के कारण विकास कार्यों और राजस्व मामलों के निस्तारण पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है। इससे जनता को भी समय पर सेवाएं मिलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा है कि लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ रहने से कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं। शासन की स्थानांतरण नीति का उद्देश्य भी यही है कि अधिकारी समय-समय पर अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दें और प्रशासनिक अनुभव का व्यापक उपयोग हो सके।अब निगाहें राज्य शासन और सामान्य प्रशासन विभाग पर टिकी हैं कि क्या निकट भविष्य में अतिरिक्त एवं सहायक कलेक्टरों की बहुप्रतीक्षित स्थानांतरण सूची जारी होगी या फिर यह मामला आगे भी लंबित रहेगा।मुख्य सवालवर्षों से एक ही जिले में जमे अधिकारियों का स्थानांतरण क्यों नहीं?जिन जिलों में अधिकारी अतिशेष हैं, वहां से रिक्त जिलों में पदस्थापना कब होगी?नए जिलों में प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए क्या विशेष योजना बनाई जाएगी?क्या शासन जल्द व्यापक प्रशासनिक फेरबदल करेगा?प्रशासनिक व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने, सुशासन को मजबूत करने तथा सभी जिलों में समान रूप से अनुभवी अधिकारियों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक स्तर पर स्थानांतरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। अब देखना होगा कि शासन इस दिशा में कब निर्णय लेता है।




